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कृष्‍ण के दिवाने हिंदू और मुस्‍लमान, janmashtami special

krishna janmashtami

janmashtami special :’भगवान’ श्री कृष्‍ण की छवि ऐसी है कि इनके दिवने हिंदू और मुस्‍लमान दोनो ही है।  कृष्‍ण का सांवार सलोना रूप न केवल राधा के नयनों में बसा था, बल्कि उनकी प्रेम दिवानी मीरा थीं। विरह की आग में अकेले राधा ही नहीं मीरा और मुगलानी भी झुलसी थी। तभी तो उस समय के मुल्‍ले उसे बावरी कहते थे। कृष्‍ण नाम प्रेम का ऐसा बी हे जिसके हृदय में फूटता है तो बस ओ कृष्‍ण का ही हो कर रह जाता है, तभी तो अमीर खुशरो लिखते हैं- ‘छाप तिलक सब छीन ली रे मोसे नैना मिलाइके…’

कृष्‍ण प्रेम का वह स्‍वरूप है जो महजब की बंदिशों से परे है। कृष्‍ण यदि सूर के आरध्‍य हैं तो रसखान, रहीम और आलम शेख के भी।  16 कलाओं से परिपूर्ण श्री कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर आइए जानते हैं कृष्‍ण भक्‍त मुस्लिम कवियों के बारे में जिन्‍हें ने मोर मुकुटधारी बंसरी वाले पर अपना सबकुछ वार दिया।

रसखान (Raskhan) के घनश्‍याम

कृष्‍ण भक्‍त मुस्‍लिम कवियों में यदि किसी कव‍ि का नाम पहले आता है तो वह हैं रसखान(Raskhan)।  रखखान का असली नाम सैयद इब्राहमि था।  रीतिकालीन कवियों में रसखा का नाम अत‍ि महत्‍वपूर्ण है।  कहा जाता है कि रसखान कृष्‍ण के अनन्‍य भक्‍त थे।  रसखान विट्ठल नाथ के शिघ्‍य और वल्‍लभ संप्रदाय के सदस्‍य थे। सरखान कृष्‍ण के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों के प्रत‍ि श्रद्धा रखते हैं।  रसखान वाकई में अपने नाम के अनुरूप रसों की खान थे।  रसखान की रचनाओं में भक्ति और शृंगार रस दोनो की प्रधानता है। कविवर रसखान की रचनाओं में फाग लीला, रासलीला, प्रेम वाटिका, कुंजलीला, सुजान रसखान आदि प्रमुख है।

अमीर खुसरो (Aameer Khusro)के कृष्‍ण

भारतीय साहित्‍य में 14वीं सदी को भक्ति काल कहा गया है।  इसी काल में सूफीवाद Soofiwad का जन्‍म हुआ। इसी सूफीवाद के सुप्रसिद्ध कवि हुए अमीर खुसरो(Aameer Khusro)।  सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलयिा के सबसे चहेते शार्गिद अमीर खुसरो (Aameer Khusro) का काम रसखान से बहुत पहले है।  अमीर खुसरो की रचना- ‘ छाप तिलक सब छीनी ली रे…’ कृष्‍ण भक्ति की छाप दिखती है।
खुसरो की इस कालजयी रचना के बारे में कहा जाता है कि एक दिन निजामुद्दीन औलिया (Hajrat nijamuddin Aulia) के सपने में कृष्‍ण ने दर्शन दिए थे।  इसके बाद औलिया ने अमीर खुसरो से कृष्‍ण के बारे में कुछ रचने को कहा।

इसके प्रेरित हो कर सुखरों ने – ‘ छाप तिलक सब छीनी ली रे मोसे नैना मिलाइ‍के…’ लिखा। खुसरो की यह सूफी रचाना इतनी लोकप्रिय हुई कि इसे सुनने वालों के मन में कृष्‍ण की छवि अपने अाप उभर आती है।  हलांक‍ि इस रचना में खुसरों ने कहीं भी कृष्‍ण का जक्रि नहीं किया है, लेकिन छवियां कृष्‍ण की ही मिलेंगी। इस रचना की अगली पंक्‍ति को ध्‍यान से सुने जिसमें वो लखिते हैं’ … एरी सखी मैं जो गई थी पनिया भरन को, छीन झपट मोरी मटकी पटकी मोसो नैना मिलाइके…’।  यह खुसरो और उनके गुरु हरज निजामुद्दीन औलिया (Hajrat nijamuddin Aulia)की कृष्‍ण के प्रत‍ि अगाध आस्‍था ही थी क‍ि खुसरो की इस कालजयी रचना को सदियों बाद भी लोग उतनी ही सिद्दत के साथ गाते और सुनते हैं।

यही नहीं सईद सुल्‍तान नाम के एक कवि ने भी ‘नवी बंगश’ नामक ग्रंथ में श्रीकृष्‍ण को इस्‍लाम मान्‍यताओं के हिसाब से नबी का खिताब बख्‍शा है।  पूर्व राज्‍यपाल विश्‍वंभर नाथ पंडेय के अनुसार एक अन्‍य कवि अलिराजा ने कृष्‍ण ओर राधा रानी के प्रेम में कई कवतिाएं लिखी थी।  बंगाल के सुल्‍तान रहे नाजिर शाह और हुसैन शाह ने बंग्‍ला में महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण का अनुवाद करवाया था। (कृष्‍ण के दिवाने हिंदू और मुस्‍लमान)

साल बेग  Sal begh के जगन्‍नाथ

यह मुस्लिम संत है। सालबेग  Salbegh  इस्‍लाम को मानते थे, लेकिन वह भगवान कृष्‍ण के अनन्‍य भक्‍त थे।  आज भी ओडिसा Odisa के जगन्‍नाथपुरी रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्‍ना का रथ साल बेग की मजार के सामने रुक कर ही आगे बढ़ता है।  इनके बारे में कहा जाता है कि साल बेग की माता हिंदू थी और पिता मुस्‍लमान थे।  मुगल सैनिक होते हुए भी साल बेग भगवान जगन्‍नाथ की भक्ति में दिनरात रमा रहते थे।

आलम शेख AAlam Shekh की रचनाओं मेे बाल कृष्‍ण

आलम शेख रीतिकाल के मशहूर कवि हुए।  इनकी रचनाओं में कृष्‍ण का बालपन झलकता है।  रसखान की तरह ही आलम शेख AAlam Shekh लिखते हैं-
‘पालने खेलत नंद ललन छलन बलि, गोद लै लै ललना कर मोद गान’  इनकी रचनओं में ऐ एक है।   आलम शेख AAlam Shekh की रचनाओं में ‘आलम केलि’, ‘स्‍याम स्‍नेही’, ‘माधवानल’, ‘काम कंदला’ प्रमुख रचना है।

नजीर अकबराबादी Najeer AKbrabadi के कृष्‍ण कन्‍हैया (कृष्‍ण के दिवाने हिंदू और मुस्‍लमान)

ऊर्दू के मशहूर शायर नजीर अकबराबादी Najeer AKbrabadi का कृष्‍ण प्रेम भी राधारानी और मीराबई की तरह ही है।  रसखान (Raskhan)  की तरह ही नजीर अकबराबादी की रचनाएं भी कृष्‍ण भक्‍ित में पगी हुई है।  नजीर को कृष्‍ण पैगमर की तरह दिखते हैं, तभी तो नजीर लिखते हैं- तू सबका खुदा, सब तुझपे फिदा, अल्‍ला हो गनी, अल्‍ला हो गनी।
है कृष्‍ण कन्‍हैया नन्‍दलाला, अल्‍ला हो गनी, अल्‍ला हो  गनी…।
यही नहीं नजीर ने कृष्‍ण चरित्र के साथ ‘कृष्‍ण का बालपन’, और ‘बलदेव जी का मैला’ नाम कविता लिखी जो काफी लोक प्रीय हुई।

नवाब वाजिद अली शाह Wajed Alli Shah के कन्‍हैया

अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह भी श्‍याम सलोने भगवना कृष्‍ण के दिवानों में से एक हैं।  वाजिद अली शाह Wajed Alli Shah का एक नाम कन्‍हैया भी था।
उजड़ती रियासत लखनऊ के आखिरी वारिस वाजिद अली शाह जितनी अपनी विलासिता पूर्ण जिंदगी के लिए चर्चित हैं, उतना ही वह एक उम्‍दा कलाकार, आवि और साहित्‍यकार रहे।  वाजिद अली शाह भगवा श्री राम की नगरी अवध के होते हुए भी कृष्‍ण की मोहिनी मूरत पर फिदा थे।  वाजिद अली शाह ने 1843 में राधा-कृष्‍ण पर एक नाटक करवाया था।  इसका निर्देशन भी उन्‍होंने खुद ही किया था।  यही नहीं नवाब की ठुमरी में भी कृष्‍ण भक्ति झलकती है। (कृष्‍ण के दिवाने हिंदू और मुस्‍लमान)

मुगलानी Muglani की कृष्‍ण भक्ति

अन्‍य मुस्लिम कवियों की तरह ही ताज मुगलानी भी मीरा की ही भांति ता उम्र कृष्‍ण की भक्ति में डूबी रही।  ताज मुगलानी लिखती हैं-‘ निहचै करि सेाधि लेहु, ज्ञानी गुनवंत बेग, जग में अनूप मश्रि, कृष्‍ण का मिलाप है।  ताज मुगलानी का मानना था क‍ि कृष्‍ण जैसा अनुमप मित्र का मिलना सभी दुखों का दूर होना है।

यह भी कृष्‍ण भक्‍त

कृष्‍ण के भक्‍तों में स्‍वतंत्रा सेनानी मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना जफर अली शाह बरकतुल्‍लाह सहित अनगिनत कवियों ने मजहब की सीमाएं लांघ कर कृष्‍ण प्रेम पर बहुत कुछ रचा है। क्‍योंकि कृष्‍ण प्रेम का जो दर्शन तैयार करते हैं, पथ (रास्‍ता) दिखाते हैं वह धर्म की सीमाओं से परे है। तभी तो ऊर्दू के मशहूर शायर अली सरदार जाफरी लिखते हैं-
‘ अगर कृष्‍ण की तालीम आम हो जाए
तो फित्‍नगारों का काम तमात हो जाए
मिटाएं बिरहम शेख तफ़र्रूकात अपने
जमाना दोनो घर का गुलाम हो जाए।।’

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