नारी सशक्तिकरण की मिशाल, महिलाएं बनीं लेखपाल

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रजनीश मिश्र, गाजीपुर : देश की आधी आबादी के सपनों को ‘पंख’ लग गए हैं। क्‍योंकि चुल्‍हे-चौके और घर की दहलीज के अंदर दम तोड़ते अरमान अब अंगड़ाई लेने लगे हैं। तभी तो देश के प्रधानी मंत्री द्वारा दिए गए स्‍लोगन  ‘ बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’  को साकार करती महिलाएं देश के सर्वोच्‍चशिखर तक पहुंचने लगी हैं। 20 वीं सदी में महिलाओं की पहुंच जमीन से आसमान तक, सरहद से खेत तक, लेखपाल से वैज्ञानिक तक हो चुकी है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो  आसमानों में उड़ने की आशा पूरी हो रही है। या यूं कहें कि धरती और आसमां उनकी मुट्ठी में है। हम बात कर रहे हैं 2015 में उत्‍तर प्रदेश में हुए महिला लेखपालों की भर्ती की।   जिले के उतरांव निवासी लेखपाल मंसा देवी कहती हैं कि वाकई में देश नारी सशक्तिकरण की तरफ बढ़ रहा है।

समय की जरूरत है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा

जिले के का‍सीमाबाद तहसील में तैनात लेखपाल मंसा देवी कहती हैं प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया ‘बेटी बचाओ’ का नारा समय की जरूरत है।  क्‍योंकि बेटियों के भी अपने सपने होते हैं। इन सपनों को साकार करने में मायके और ससुराल दोनों पक्षों का सहयोग अपेक्षित है। किसी कारण वश बेटी मायके में नहीं पढ़ पाती है तो ससुराल वालों को चाहिए कि वह उसे पढ़ाएं-लिखाएं और उसके स्‍वावलंबी बनाएं जैसाकि हमारे साथ हुआ।  मंसा कहती हैं कि शादी के बाद उनके ससुराल वाले खास कर उनके पति अंजनी मौर्य ने उनका भरपूर साथ दिया।

अटपटा तो लगा लेकिन अब गर्व है

मंसा कहती हैं कि 2015 में बतौर उन्‍होंने लेखपाल ज्‍वाईन किया।  उस समय लड़कों के साथ प्रशिक्षण फिल्‍ड वर्क में थोड़ी असहजता महसूस हुई । लेकिन अब उन्‍हें पटवारी बनने पर गर्व है। यह पूछे जाने पर कि घर के चौखट के बाहर खेतों की पैमाइस करते समय कभी कोई परेशानी आती है या नही।  इसपर वे कहती हैं – देखिए समाज में हर तरह के लोग है। कभी किसी से कोई धमकी मिलती है तो किसी से कुछ लेकिन इन्‍हीं में बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो सहयोग करते हैं।

अच्‍छती जरह निभाती हूं फर्ज

इसी तरह सुष्मिता सिंह और माधुरी सिंह कहती हैं जब पहली फिल्‍ड में गई तो थोड़ी झीझक हुई। मन मे तरह तरह की आशंकाए थीं। अब जरीब पकड़ कर जमीन की पैमाई करने में कोई परेशानी नहीं होती।  हमलोग पूरा समय फिल्‍ड में देती हैं। पर्दे में रहने वाली महिला जब बंदिशों की दिवार तोड़ अपने सपनों को साकार करती है तो अच्‍छा लगता है।  इसी तरह सरिता यादव कहती हैं, अब महिलाओं की जिंदगी चुल्‍हे चौके तक ही नहीं है। इससे बाहर भी उनकी दुनिया है।  महिलाओं का दायरा बढ़ा है। सरहद की निगेबानी से लेकर आसमान की ऊंचाई, सागर की गहराई और समंदर का सीना तक महिलाएं नाप रही हैं।
12 महिला लेखपाल हैं कासीमाबाद तहसील में
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कासीमाबाद तहसील में कुल 12 महिला लेखपाल हैं।  इनमें एक पिंकी कुमारी जो बिहार से थीं, वह अब मधेपुरा की एसडीएम हैं।  यह बदलते भारत की नई तश्‍वीर है जो हमारी बेटियां पेश कर रही हैं। गाजीपुर जिले में लगभग 120 महिला लेखपाल हैं। इनमें मंसा, ममता यादव, रीता यादव, नेहा यादव, सरिता यादव, संगीता यादव, सुनिनता यादव पूजा रानी, सुष्मिता सिंह, माधुरी सिंह, कमला यादव, मीना चौहान आदि कासिमाबाद तहसील में है।  लोगों को चाहिए कि वो बेटों की तरह बेटियों को भी आगे बढ़ने का मौका दें।

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