अमृतसर। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन, शिव के निराकार से साकार (लिंग) रूप में प्रकट होने और उनके द्वारा हलाहल विष पीकर सृष्टि को बचाने का प्रतीक है। यह रात आध्यात्मिक जागरण, आत्म-संयम, ध्यान और कुंडली जागृत करने के लिए सर्वोच्च मानी जाती है। महाशिवरात्रि (Mahashiwratri) के दिन से ही होली की शुरुआत मानी जाती है।
महाशिवरात्रि के दिन शिवाला बाग भाइयां का उल्लेख खास तौर से करना आवश्यक है। शिवालाबाग भाइयां अमृतसर के उन प्राचीन मंदिरों में से एक है जो शिव और शक्ति का बोध कराता है। वैसे तो यह मंदिर वर्षभर श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र बना रहता है, लेकिन महाशिवरात्रि को यहां उमड़ा आस्था का ज्वार इस बात की तसदीक करता है कि भक्त अपने आरध्य का दर्शन पाने के लिए कितना उतावले हैं।
स्वर्णाछादित मंदिर के शिखर पर पवनांदोलित धर्मध्वज, हाथों में पूजा की थाल लिए पौ फटने से पहले ही बसंत की गुलाबी ठंड में आराध्य के एक झलक पाने के लिए अपनी बारी की प्रतिक्षा में लंबी-लंबी कतारों में खड़े भक्त माथे का पसीना पोछते हुए जब एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं आस्था सजीव हो उठती। ना किसी से कोई शिकवा ना शिकायत। बस एक ही धुन सनातन सत्य के स्वरूप नील कंठ महादेव के दर्शन कररा। यही तो है सनातन की खूबसूरती जो देश दुनिया के विभिन्न धर्मावलंबियों को सनातन पर अनुसंधान और अनवेषण करने को विवश कर देता है।
अमृतसर में शिवतत्व को बोध कराने वाले शिवाला बागभाइयां की नींव कब और कैसे पड़ी। इसके बारे में ठीक-ठीक किसी को पता नहीं। कोई कहता है पार्टिशन के समय मुल्तान से आया कोई शिवभक्त अपने साथ शिवलिंग लेकर आया था, जिसे यहां पर स्थापित किया गया। वहीं कुछ लोगों को मानना है कि अविभाजित भारत के मुल्तान से लाया गया शिलिंग यहां पर स्थापित किया गया था। प्रबंधकों के अनुसार पहले यहां एक छोटा सा मंदिर होता था, जो धीरे-धीरे शिवभक्तों की आस्था का केंद्र बनता गया और मंदिर का विस्तार होता गया। बताया जाता है कि जिस स्थान पर यह भव्य मंदिर जिस भारतीय सनातन संस्कृति का बोध करवा रहा है उस स्थान पर पहले बाइयों का बाग हुआ करता था। उन्हीं भाइयों के नाम पर इस स्थान का नाम बाग भाइयां पड़ा। बहरहाल कौन सा तर्क ठीक है। यह कहना थोड़ा कठिन है। पर इतना तो सत्य है कि यह स्थान अमृतसरियों को शिवशक्तति का बोध जरूर करवा रहा है।
सौ साल से भी पुराना, शीशे की कारीगरी करती है आकर्षित
शिवाला मंदिर करीब सौ साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। मंदिर प्रबंधन कमेटी के जनरल सेक्रेट्री संजय अरोड़ा के अनुसार मंदिर का कुल रकबा करीब 5,000 वर्ग गज से भी अधिक है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन इस मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं के भी विग्रह प्रतिष्ठापित है। मंदिर की दीवारों और छतों पर की गई शीशे की बारीक नक्काशी अलग ही आभा व्यक्त करती है।
सोना का शिखर चांदी के दरवाजे
मंदिर प्रबंधन कमेटी के प्रधान जितेंद्र अरोड़ा कहते हैं कि मंदिर का शिखर स्वर्ण पत्तरों से मढ़ा हुआ है। शिव मंदिर में लगे तीनों दरवाजे चांदी हैं। इन दरवाजों पर विभिन्न दवेताओं की आकृतियां बनी हुई हैं। यदि बात करें मंदिर के शिखर या चोटी पर लगाए गए सोने कि तो 15 किलो से अधिक सोने पत्तर शिव मंदिर के शिखर पर लगाए गए हैं, जो सूर्य की किरणों से अप्रतीम आभा विखेरते हैं। वहीं पूनम की रात में मंदिर के शिखर की कांति देखते ही बनती है। मंदिर कमेटी के वाइस प्रधान सुरेश महाजन कहते हैं कि शिव मंदिर में तीन दरवाजे हैं। इन तीनों दरवाजों पर चांदी के पतरे मढ़े गए हैं, जिनका कुल वजन 45 किलोग्राम के करीब है। यानी एक दरवाजे पर 15 किलो चांदी लगाई गई है। इसके आलावा जलहरी पर भी चांदी चढ़ाई गई है, जिसका कुल वजन 500 ग्राम के आसपास है। इसी तरह भगवान शिव को एक किलो 300 ग्राम के चांदी का छत्र लगाया गया है। यह छत्र वर्ष 2025 में किसी भक्त ने अर्पित किया था।
मंदिर प्रबंधन कमेटी के अनुसार शिव मंदिर के गर्भगृह की दीवारों को पर शिव परिवार के भित्ति चित्र बनाए गए है। ये भित्तिचित्र करीब 100 ग्राम के सोने के तीन पतरों पर बनाए गए हैं जो मंदिर के तीनों दरवाजों के ऊपर लगाए गए हैं।
60 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं मंदिर में
वैसे तो शिवाला बाग भाइयां में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि को शिवभक्तों की संख्या 60 हजाार से उपर पहुंच जाती है। इस दिन भक्तों को कुछ पग का पासला तय करने में घंटों लग जाता है, फिर भी थकान से निढाल शिभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। पूरे दिन ” ऊं नम: पार्वती पतये हर हर महादेव” के जयकारों से मंदिर परिसर गूंजता रहता है। ऐसा आभास होता है जैसे शिवभक्त अमृतसर में नहीं काशी में काशी विश्वनाथ का दर्शन कर रहे हैं।