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विदिशा, यहां आज भी मौजूद है हजारों साल पुराना गरुण ध्वज स्तंभ

विदिशा, यहां आज भी हजारों साल पुराना गरुण ध्वज स्तंभ

मध्य प्रदेशका एक ऐसा शहर जिसका उल्लेख न केवल इतिहास के पन्नों में हैं,बल्कि इसका जिक्र महर्षि वाल्मिकी ने रामायण में और महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में किया है।

शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाति की राजधानी थी विदिशा

यह ऐतिहासिक शहर है विदिशा, जिसे प्राचीन काली में बेस नगर के नाम से जाना जाता था। ब्रह्मपुराण में वर्णित विदिशा के बारे में कहा जाता है कि भगवान श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न का पुत्र शत्रुघाति यहां का प्रतिनिधि हुआ करता था।

विदिशा के यवनों ने ही दिया था युधीष्ठिर को अश्वमेघ का घोड़ा

ब्रह्मपुराण के अनुसार इस जगहका नाम भद्रावित था, जो यवनों रहने का स्था था। इन्हीं यवनों ने युधीष्ठिर को अश्वमेध का घोड़ा दिया था। यही नहीं विदिशा में हिंदू, बौध और जैन धर्म को पुष्पित और पल्लवित होने का मौका मिला था। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का शहर अपने वैभवकाल में वेस नदी के किनारे बसा था, जिस कारण इसका नाम विदिशा या वेस नगर पड़ा।

१४०-१३० ईपूर्व का बना है गरुण ध्वज स्तंभ

आपको जान कर हैरानी होगीकि तक्षशिला के एक यूनानी शासक का दून बन कर हेल्योडोरस शुंग वंश के शासक काशीपुत भाग भद्र के काल में १४०-१३० ईपूर्व में विदिशा आया था। हेल्योडोरस हिंदूधर्म से इतना प्रभावित हुआ कि वह भागवत धर्म का अनुयायी बन गया। यही नहीं उसने इसी विदिशा में भगवा विष्णु का गुरुण ध्वज स्तंभ स्थापित किया।

मंदिर खंडहर बचे हैं शेष

यह स्तंभ एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया है। इसके साथ ही यहां पर भगवान विष्णु का भव्य मंदिर भी बनवाया था। लेकिन अब इस मंदिर के खंडहर ही शेष बचे हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर वेस नदी में बाढ़ आने से नष्टहो गया।

पाली भाषा में लिखा है लेख

रुण ध्वज स्तंभ पर पाली भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा एक अभिलेख है। विदिशा में ही तीसरी शताब्दी के बौद्ध स्तूप मिले हैं, जिसे विश्व प्रसिद्ध सांची के स्तूप से भी पहले का माना जाता है। आप को बता दें कि नोबेल पुरकार विजेता कैलाश सत्यार्थी इसी विदिशा के रहने वाले हैं। यही नहीं लोक सभा में विदिशा का प्रतिनिधित्व भाजपा नेत्री सुषम स्वराज किया करती थीं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

विदिशा, यहां आज भी हजारों साल पुराना गरुण ध्वज स्तंभ

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