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अमृतसर (Amritsar) : धर्म और इतिहास की नगरी के रूप में पहचान रखने वाले अमृतसर में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे आस्था और चमत्कारों की कहनियां जुड़ी हुई हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है प्राचीन शनिदेव मंदिर।
शहर के घंटाघर चौक पर स्थित यह मंदिर करीब 320 साल पुराना है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां शनिवार को शनिदेव के दर्शन और पूजन करने से शनि की साढ़ेसाती, अढ़ैया और शनि दोष दूर होते हैं। इन्हीं मान्यताओं के चलते यहां प्रतिदिन शनि भक्तों का तांता लगा रहता है। हलांकि शनिवार को इन भक्तों की संख्या आम दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक हो जाती है। भीड़ के कारण स्थिति यह हो जाती है कि अपने आराध्य के दर्शनों के लिए घंटों कतारबद्ध हो कर अपनी बारी प्रतिक्षा करते-करते श्रद्धालुओं को सर्दी के मौसम में भी पशीना आ जाता है, फिर भरी इनका उत्साह ज्यों का त्यों बना रहता है।
कब और कैसे हुआ मंदिर का निर्माण
मंदिर कमेटी के मुताबिक शनि देव मंदिर का निर्माण विक्रमी संवत 1761 यानी करीब 320 साल पहले गौड़ ब्राह्मण परिवार की ओर से करवाया गया था। मान्यता है कि तत्कालीन समय में पंडित केदारनाथ नाम के एक संत इसी स्थान पर (आज जहां शनि देव मंदिर है) एक पीपल के पेड़ के नीचे भगवान शनि देव की आराधना और ध्यान करते थे। जब यह बात लोगों को पता चली तो लोग उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद लेने के लिए आने लगे। उनमें से एक पुरुषोत्तम दास नाम के राजस्थानी मारवाड़ी भी थे, जो प्रतिदिन प्रार्थना करने आते थे।
कहा जाता है कि सेठ पुरुषोत्तम दास और उनकी पत्नी की अटूट भक्ति के बावजूद 55 वर्ष की आयु तक कोई संतान नहीं थी। इससे उदास पुरुषोत्तम दास पं. केदार नाथ से अपने लिए प्रार्थान करने की गुजारिश की और साथ ही संतानोपत्ति के बाद शनि मंदिर (Shani tempie)का विस्तार करने का वचन दिया। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष बाबा त्रिलोकी नाथ के अनुसार ईश्वर की इच्छा ओर शनिदेव की कृपा से पुरुषोत्तम दास को संतान की प्राप्ति हुई। पुरुषोत्तमदास ने अपने बेटे का नाम पहाड़मल रखा, यह नाम पर्वत के समान शक्ति का प्रतीक है। । बाबा त्रिलोकी नाथ बताते हैं कि कुछ समय बाद पुरुषोत्तम दास ने अपना वादा निभाते हुए शनिदेव मंदिर का विस्तार किया जिसकारण यह मंदिर पहले से और भव्य हो गया।
मुगल, सिख और ब्रिटिश काल का गवाह भी रहा मंदिर
स्थानीय लोगों के मुताबिक यह शनि मंदिर गुरु नगरी के अलावा उत्तर भारत का एक मात्र ऐसा मंदिर है जो 300 साल से भी अधिक प्राचीन होने का गौरव समेटे हुए है। लोगों के मुताबिक इस मंदिर की नींव में लगी ईंटों ने मुगल, सिख और ब्रिटिश शासकों के शासन को भी देखा है, लेकिन कभी किसी शासक ने शनि देव सत्ता को चुनौती देने की हिमाकत नहीं की। महाराजा रणजीत सिंह का शासन तो सर्वधर्म समभाव का शासन था। महाराजा रणजीत सिंह का शासन को पंजाब स्वर्ण युग था। क्योंकि महाराजा के शासन में हिंदू और सिख धर्म तो पुष्पित और पल्लवित हुए ही साथ इस्लाम को भी वह समान भाव से देखते थे। रही बात अंग्रेजों कि तो उन्होंने भी कोई क्षति नहीं पहुंचाई।
सत्ता और शासन बदलता रहा, मंदिर की लोकप्रियता कायम रही
मंदिर के प्रमुख पुजारी पं. प्रमोद गौड़ कहते हैं कि पहले यह मंदिर तीन मंजिला था। मंदिर की हर मंजिल भव्य थी, लेकिन समय काल की चुनौतियों साथ-साथ मंदिर में ऊपरी मंजील जीर्ण और कमजोर हो गई थी, जिस कारण उसे गिरने से बचाने के लिए ऊपरी मंजिर को हटा दिया गया। पं. प्रमोद कहते हैं कि समय के साथ शासन और सत्ता बलदती रही। कभी देश मुगलों के अधीन था तो कभी अंग्रेजों के। फिर भी शनि देव मंदिर की लोकप्रियता कायम रही।
मान्यता इतनी कि काबुल तक से आते थे श्रद्धालु
मंदिर कमेटी के प्रधान कहते हैं कि भारत विभाजन से पहले लाहौर तक के श्रद्धालु इस प्राचीन शनि देव मंदिर (Shani tempie) में माथा टेकने आते थे। प्रधान बाबा त्रिलोकी नाथ कहते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह के शासन से लेकर ब्रिटिश काल में भी अमृतसर व्यापार का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। क्योंक्ति श्री गुरु रामदास महाराज जी ने गुरु नगरी को आबाद ही इस तरह से किया था कि यह धार्मिक शहर होने साथ-साथ व्यापार का भी बहुत बड़ा केंद्र था और अब भी है। सन 1947 यानी पाकिस्तान बनने से पहले तक कटारा आहलुवालिया कपड़े और चाय का बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था। यहां लंहदा पंजाब के लोग तो आते ही थे काबुल तक के व्यापारी व्यापार करने आते थे और दरबार सहिब में माथा टेकने के साथ-साथ शनि मंदिर में भी शीश नवाते थे।
एक सपना आया और भाग खड़ा हुआ परियोजना अधिकारी
कहा जाता है कि कुछ वर्षों पहले जब स्वर्ण मंदिर विरासत परियोजना का विस्तार हो रहा था, उस समय परियोजना अधिकारियों ने बस स्टैंड तक सीधा रास्ता बनाने के लिए मंदिर को हटाने की योजना बनाई। अधिकारी चाहते थे कि मंदिर की जगह भगवान शनि देव की मूर्ति को ही रखा जाए। अधिकारियों की इस योजना का स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया। कहा जाता है कि परियोजना अधिकारी आंध्रप्रदेश के थे, उन्हें सपने में अनुभव हुआ कि शनि देव उन्हें चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तुमने मंदिर हटाने का अपना फैसला नहीं बदला तो तुम्हारा परिवार और पीढ़िया इस फैसले पर पछताएंगी। इस घटना के बाद अधिकारी ने अपना फैसला बदल दिया और इस परियोजना से खुद को हटाने का अपने उच्चाधिकारियों से अनुरोध किया। कहते हैं कि परियोजना अधिकारी ने मंदिर की भतरी दीवारों पर खुद के खर्च से टाइलें लगवाई।
हर तीन माह बाद लगता है भंडार
मंदिर के मुख्य पुजारी कहते हैं कि यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए पूरा दिन खुला रहता है, लेकिन शनिवार को तड़के तीन बजे से रात तीन बजे तक खुला रहता है। इस दौरान शनि देव महाराज का तैलाभिषेक किया जाता है। भक्तों की कतार तड़के ही लग जाती है जो देर रात तक जारी रहती है। वे कहते हैं कि प्रत्येक शनिवार को लंगर लगाया जाता है, लेकिन प्रत्येक तीन माह बाद भंडारा किया जाता है, जिसमें सैकड़ो श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं।
धर्मार्थ कार्यों में खर्च किया जाता है चढ़ावे में मिला तेल
पं. प्रमोद गौड़ कहते हैं कि भगवान शनिदेव तुरंत न्याय करने वाले देवता हैं। इन्हें काली वस्तुएं अत्यंत प्रीय हैं। शनिवार को तैलाविषेक के दौरान चढ़ाया जाने वाला तेल, वस्त्र और अन्य वस्तुएं धर्मार्थ के कार्यों में लगाई जाती है। तेल, तिल आदि का प्रयोग भंडारा लंगर में किया जाता है।
इसलिए लोग पहनते हैं लोहे का छल्ला
भगतां वाला शिव मंदिर के आत्म प्रकाश शास्त्री कहते हैं कि ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रहों में शनि को सातवां ग्रह माना जाता है जो सूर्य से सबसे दूर है और सौरमंडल में बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बड़ा है। आत्म प्रकाश शास्त्री के अनुसार खगोलीय रूप से, यह सूर्य से छठा ग्रह है और अपने वलय (छल्लों) के लिए प्रसिद्ध है, जिसे ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण, कर्मफलदाता ग्रह माना जाता है जो धैर्य, अनुशासन और न्याय का प्रतीक है। आत्म प्रकाश के अनुसार जिन पर शनि की छाया होती है वे विशेष रूप से लोहे का छल्ला ( रिंग ) पहनते हैं।
शनि देव के बारे में मुख्य बातें
- शनिदेव कर्मफल दाता हैं, जो कलयुग के न्यायाधीश भी कहलाते हैं।
- ये सूर्य देव (सूर्य नारायण) और छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं, यमराज इनके भाई और यमुना नदी इनकी बहन हैं।
- पुराणों में इनका वर्णन एक काले रंग (वैदूर्य कांति) की आकृति के रूप में किया गया है, जो भैंसे या कौवे पर सवार होते हैं और हाथ में शस्त्र (तलवार) लिए होते हैं।
- स्वभाव से वे कठोर न्याय करते हैं और हर किसी को उसके कर्मों का फल देते हैं। अच्छे कर्म करने वालों को लाभ और बुरे कर्म करने वालों को दंड मिलता है, हालांकि वे मोक्ष देने वाले ग्रह भी माने जाते हैं।
पूजा और उपाय
- “ॐ शं शनैश्चराय नमः” का जाप।
- शनिवार को पीपल वृक्ष की पूजा, सरसों के तेल का दीपक जलाना, जल चढ़ाना और परिक्रमा करना शुभ होता है।
- लोहा, तिल, तेल, काले वस्त्र और गरीबों को भोजन दान करना चाहिए।
- काला रंग, लोहे की वस्तुएँ, तिल के लड्डू पसंद हैं।
- हनुमान चालीसा का पाठ करने से भी शनि दोष कम करता है।