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POCSO case: पॉक्सो केस की सुनवाई यदि हो सुस्त…तो कैस हो नाबालिगों का सर्वोत्तम हित

If the hearing of POCSO case is slow then how can the best interest of minors be served?

ओजस्कर पाण्डेय
पिछले दिनों नाबालिगों से दुष्कर्म के मामलों में जल्द न्याय को लेकर मध्य प्रदेश का जिक्र किया जा सकता है। एमपी में पॉक्सो Pocso एक्ट के तहत कुछ दिन की सुनवाई के बाद दुष्कर्म के आरोपियों को फांसी की सजा सुना दी गई। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि मध्य प्रदेश में पॉक्सो के 10,950 मामले सुनवाई के लिए लंबित हैं। वहीं देश में यह संख्या 90 हजार से ज्यादा है, जिन्हें खत्म करने में सालों लग जाएं जाएंगे और तब तक पीड़ित बच्चे बालिग हो जाएंगे।
बच्चों के साथ बढ़ती दुष्कर्म की घटनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट को संशोधित कर नया कानून बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जिला कोर्ट, स्पेशल कोर्ट सहित सभी अदालतों को एक साल में इस तरह के मामले निपटाने के आदेश दिए हैं। वही, हकीकत में ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है क्योंकि इससे संबधित मामलों की सुनवाई की रफ्तार सुस्त है।

दिल्ली में 6110 केस लंबित

दिल्ली की बात करें तो यहां 6110 केस लंबित हैं, जिनकी सुनवाई 14 कोर्ट में चल रही है और सुनवाई की रफ्तार को देखते हुए इनका एक साल में निपटारा मुश्किल है। जानकारी के मुताबिक इन मामलों के ट्रायल में कई तरह की समस्याएं हैं, जिन्हें पहले खत्म करना होगा। पॉक्सो Pocso एक्ट के सेक्शन 35(2) के अनुसार चार्जशीट दायर होने के बाद एक साल में केस का निपटारा होना चाहिए, लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता है। मामले एविडेंस स्टेज पर हों तो कुछ नहीं कर सकते।

2018 में 4155 एविडेंस स्टेज पर हैं केस

2018 की बात करें तो दिल्ली में लंबित 6110 केसों में से 4155 एविडेंस स्टेज पर हैं। मतलब किसी में गवाही हो रही है तो किसी में फोरेंसिक रिपोर्ट या डीएनए रिपोर्ट का इंतजार है। कई में दस्तावेज फाइल होना बाकी है। इस तरह सुनवाई टलती रहती है और केस लंबा खिंचता रहता है। निचली अदालत सें सजा मिलने के बाद भी दोषी के पास हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति से गुहार लगाने का अधिकार होता है, जिसमें एक साल से ज्यादा का वक्त आसानी से निकल जाता है। ऐसे में अपील, पुनर्विचार व दया याचिका का निपटारा भी जल्द हो। डीएनए टेस्ट और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करने में करीब एक साल का वक्त लग जाता है, क्योंकि दिल्ली में एक ही फोरेंसिक लैब है।

दिल्ली के हर जिले में होनी चाहिए एक लैब

दिल्ली के हर जिले में एक लैब यानी 11 जिलों में 11 लैब होनी चाहिए। इसके साथ साथ ही रिपोर्ट देने का वक्त तय होना चाहिए। अगर तय वक्त में रिपोर्ट नहीं मिलती है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। दिल्ली में पॉक्सो कोर्ट की कमी है।

दिल्ली में महिला एसआई की संख्या बढ़ाने की जरूरत

राजधानी की 14 अदालतों में पॉक्सो Pocso एक्ट के तहत सुनवाई हो रही है, लेकिन इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, डकैती जैसे कई संगीन मुकदमों की भी सुनवाई होती है। राजधानी में करीब 30 पॉक्सो कोर्ट बनें और उनमें इनके अलावा किसी और मुकदमे की सुनवाई न हो। पॉक्सो केस में महिला एसआइ जांच अधिकारी होती हैं, लेकिन दिल्ली पुलिस में इनकी संख्या सिर्फ एक हजार है। इनकी संख्या बढ़ाने पर ध्यान देने की जरूरत है। सरकारी वकील पॉक्सो के साथ अन्य मामलों के भी मुकदमे लड़ते है। पॉक्सो कोर्ट के सरकारी वकील केवल पॉक्सो मामल ही देखें, अभी तक दिल्ली में इनकी संख्या 14 है।

67 प्रतिशत मामलों में पीड़ित महिला मुकर जाती हैं बयान से

कोर्ट पहुंचने के बाद पीड़िता को दिल्ली राज्य विधिक सेवा आयोग का वकील मिलता है। पॉक्सो मामलों में एफआइआर दर्ज होते ही पीड़िता को कानूनी सहायता मिले, जिससे उसके मामले में देरी न हो। नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल बने, जो पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए काम करे। करीब 67 फीसद मामलों में पीड़िता बयान से मुकर जाती हैं, इसलिए इसको लेकर भी कड़े नियम बनें। कई मामलों में पीड़िता और परिजनों को धमकाया जाता है, जिससे केस खिंचता जाता है। पुलिस कोर्ट के आदेश पर ही सुरक्षा देती है। गवाह, पीड़ित व उसके परिवार की सुरक्षा के लिए अलग से कोई नीति बने। पॉक्सो मामलों के लंबित होने, निस्तारण और दूसरी बार दोषी का कोई रिकॉर्ड नहीं होता है, ऐसे अपराधियों का रिकॉर्ड रखने के लिए तकनीक विकसित होनी चाहिए।

दिल्ली में पॉक्सो के 1500 नए केस आते हैं हर साल

विशेषज्ञों का कहना है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को खत्म करने के लिए विशेष जज भी होना चाहिए। हर साल 1500 नए मामले दिल्ली में हर साल पॉक्सो के करीब 1500 नए केस सामने आते हैं। मौजूदा केस निस्तारण की बात करें तो इसकी दर 12 फीसद है। दिल्ली में सबसे अधिक 1467 लंबित केस तीस हजारी कोर्ट में हैं और सबसे कम 483 द्वारका कोर्ट में हैं। रोहिणी कोर्ट के वकील कैलाश तिवारी के मुताबिक जिन इलाकों में पॉक्सो मामलों की संख्या अधिक है वहा जागरूकता व सुरक्षा बढ़ाने की जरूरत है।

90 हजार से अधिक मामले देश की अदालतों में लंबित

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत 2016 तक देशभर में 36 हजार से ज्यादा मामले रजिस्टर किए गए, जबकि 90 हजार से ज्यादा मामले अभी भी देश की अदालतों में लंबित हैं। इनमें से केवल 11 हजार मामलों का ही ट्रायल पूरा हुआ है। वहीं 2016 में सबसे ज्यादा 4 हजार 815 मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए, जिनमें से केवल 1054 मामलों का ही निबटारा हुआ। जबकि वहां 17 हजार से ज्यादा मामले अभी लंबित हैं। वहीं एमपी में 2016 में 4700 मामले दर्ज हुए और केवल 2462 मामले ही खत्म हुए और 10950 हजार मामले अभी लंबित हैं।

हर घंटे 40 बच्चों का होता है यौन शोषण

नोबल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की संस्था का कहना है कि अगर आज वक्त में पॉक्सो Pocso के तहत एक भी मामला दर्ज न हो, तो तकरीबन एक लाख मामले विशेष अदालतों में विचाराधीन हैं। हर घंटे 40 बच्चों का यौन शोषण होता है, जिनमें से मात्र 4 बच्चों के मामले ही पॉक्सो के तहत दर्ज होते हैं। एक्ट के तहत एक साल के भीतर केस का ट्रायल पूरा करना होता है। पॉक्सो एक्ट में बदलाव हो जाने के बाद 0-12 साल उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसी की सजा दी जाएगी। जबकि 16 साल की लड़की का रेप करने वाले को सख्त सजा देने का प्रावधान किया जाएगा। जिसमें 2 महीने की जांच और 2 महीने का ट्रायल है। अगर ट्रायल ऐसे ही धीमी गति से चलते रहे, तो बैकलॉग बढ़ता चला जाएगा। अगर पॉक्सो के तहत कोई नया मामला दर्ज न हो तो अकेले गुजरात में पेंडिग मामले साल 2071 तक खत्म होंगे, वहीं अरुणाचल प्रदेश में साल 2117 तक और दिल्ली में 2029 तक ही बच्चों को न्याय मिल पाएगा।

दिल्ली में साल 2012 से 2015 तक 5217 केस दर्ज किए गए

दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक पॉक्सो एक्ट के तहत साल 2012 से 2015 तक 5217 केस दर्ज किए गए, जिनमें से 11 प्रतिशत की रफ्तार से केवल 575 मामलों का ही निबटारा हुआ। वहीं केरल में साल 2039, पश्चिमी बंगाल में साल 2035, महाराष्ट्र में साल 2032 और बिहार में 2029 तक ही मामले खत्म हो पाएंगे। जानकारी के अनुसार पॉक्सो मामलों का निबटारा करने के लिए देशभर में मात्र 620 विशेष अदालतें ही हैं, जबकि साल 2014 में पूरे देश में 9 हजार केस रजिस्टर किए गए, 2015 यह संख्या बढ़ कर 15 हजार पहुंच गई। वहीं इस साल सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट्स को ज्यूडिशियल कमेटी बनाने का निर्देश दिया है, जिसमें 3 से ज्यादा जज शामिल होंगे। ये कमेटी विशेष अदालतों में चल रहे पॉक्सो के तहत चल रहे मामलों पर नजर रखेगी। साथ ही शीर्ष अदालत ने देश के उच्च न्यायलयों को यह भी निर्देश दिया कि वह समय-समय पर फास्ट ट्रैक अदालतों पॉक्सो के मामलों का जल्द निबटारा करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करते रहें।

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ट्रायल का जल्द से जल्द निपटा करना जरूरी

पॉक्सो के सेक्शन 35 के मुताबिक ट्रायल का जल्द से जल्द निबटारा करना जरूरी है। वहीं हाल ही हुए संशोधनों के तहत पुलिस को अपनी जांच दो महीनों के भीतर करनी होगी, वहीं अगले दो माह में ट्रॉयल पूरा करना होगा और छह माह के भीतर अपील का निबटारा करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन अपराध संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के अंतर्गत चलने वाले मामलों की जल्द सुनवाई और फैसले को लेकर एक अहम आदेश दिया है।

कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट से कहा है कि निचली अदालतों को पॉक्सो जैसे गंभीर कानून के तहत लंबित मामलों की गैरजरूरी सुनवाई स्थगित नहीं करने के निर्देश जारी किए जाए, ताकि जांच में तेजी लाई जा सके। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट यौन हिंसा संबंधी मामलों की निगरानी और नियमन के लिए न्यायाधीशों की समितियां गठित करने के निर्देश दिए हैं। जो निचली अदालत में चल रहे फास्ट ट्रैक कोर्ट का मॉनिटर करेंगी। कोर्ट राज्यों के राज्य के पुलिस महानिदेशकों या आयुक्तों को भी विशेष कार्य बल (एसटीएफ) गठित करने के निर्देश दिए, ताकि ऐसे मामलों की जांच तेजी से किया जा सके और गवाहों की पेशी के दिन ही अदालत में सबूत पेश किए जा सकें।

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मामले लंबित

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने अदालत को सूचित किया कि सरकार ने पॉक्सो कानून में संशोधन कर 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने वालों को मृत्युदंड देने का प्रावधान किया है। अदालत को बताया गया कि पूरे देश की निचली अदालतों में पॉक्सो अधिनियम से जुड़े 112,628 मामले लंबित हैं, जिनमें से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं। इसके बाद अदालत ने ये निर्देश जारी किए। महाराष्ट्र समेत गोवा, केंद्रशासित प्रदेशों दीव एवं दमन, दादर एवं नगर हवेली में इस संबंध में लगभग 16,099 मामले लंबित हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश में 10,117, पश्चिम बंगाल में 9,894, ओडिशा में 6,849, दिल्ली में 6,100, केरल व केंद्रशासित प्रदेशलक्षद्वीप में 5,409, गुजरात में 5,177, बिहार में 4,910 और कर्नाटक में 4,045 मामले लंबित हैं।







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