अमृतसर : सन 1947 में देश की आजादी के साथ ही भारत ने विभाजन का वह दर्द भी झेला, जिसकी टीस आज भी इतिहास के पन्नों से महसूस होती है। एक लकीर ने सदियों से साथ रह रहे लोगों को रातोंरात हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बांट दिया। घर छूटे, रिश्ते बिछड़े, कारवां उजड़े और लाखों लोगों को अनजान रास्तों पर शरणार्थी बनकर चलना पड़ा। किसी ने अपनों को खोया तो किसी ने अपनी जन्मभूमि; कहीं ट्रेनों में लाशें पहुंचीं, तो कहीं इंसानियत खून के आंसू रोती दिखाई दी। यह सिर्फ जमीन का बंटवारा नहीं था, बल्कि करोड़ों दिलों, परिवारों और यादों पर खिंची वह दर्दनाक रेखा थी, जिसके निशान पीढ़ियों तक मिट नहीं सके।
कुछ इसी तरह की कहानी उन तमाम लोगों के साथ जुड़ी है, जो अपना घरबार, खेत-खलिहान, धनदौलत छोड़ मीलों का सफर तय कर भारत की सीमा में आए। कुछ जिंदा तो कुछ लाश । उनके सामने चुनौतियां रोटी से लेकर आसियाने तक की थीं। ऐसे एक एक-दो नहीं, सौ-दो सौ नहीं बल्कि दो करोड़ लोग थे, जिनका भविष्य अंधेरे में था। इन लोगों के ठहरने के लिए फिरोजपुर, फाजिल्का, अमृतसर और गुरदासपुर सहित पंजाब में जगह-जगहर शणरार्थी कैंप बनाए गए थे। इन कैंपों में यदि सुनाई देती थी तो केवल चीख और सिस्कियां । यह चीखें उन बदनसीबों की थी जिन्होंने बंटवारे में अपनों को खो दिया। कोई अपनों को खो कर तो कई अपने गांव और शहर को याद कर रो और सिसक रहा था।
8 अगस्त 1946 को ही हो गई थी माइग्रेशन की शुरुआत
खुद बंटवारे का दंश झेल चुके प्रो. दरबारी लाल कहते हैं कि देश का बंटवारा तो अगस्त 1947 को हुआ था, लेकिन माइग्रेशन की शुरुआत तो 8 अगस्त 1946 को ही शुरू हो गई थी। क्योंकि इसी दिन मुस्लिम लीग के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया था। मुलतान, पेशावर और डेरा गाजीखान में बलवा इस कदर मचा कि हिंदू सिख जान बचाकर भागने लगे, समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां जाएं। क्यों कि तब तक यह तय नहीं हो पाया था कि कौनासा शहर हिंदुस्तान का होगा और कौन नया देश पाकिस्तान का।
17 अगस्त को पता चला कि हम हिंदुस्तानी नहीं हैं
कुछ देर चुप्प रहने के बाद प्रो. लाल कहते हैं, भारत के नक्शे पर विभाजन की लकीर तो 12 अगस्त को ही खींच दी गई थी। लेकिन इसका ऐलान 17 अगस्त को किया गया। वे कहते हैं, तब मैं आठ साल का था। दादा और पिता जी से सुना कि देश 15 अगस्त को आजाद हो गया, लेकिन उसका जश्न हमारे सहित देश के अधिकांश खासकर पंजाब के लोग नहीं मना सके थे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि जहां वे रह रहे हैं वह भारत में है या पाकिस्तान में। वे असमंजस में थे कि उन्हें उसी जगह पर रहना हो गया या उनका शहर या गांव पराया मुल्क हो जाएगा।
दंगा ऐसा शुरू हुआ कि सब कुछ छोड़ कर भागना पड़ा
गली कस्तुरियां के अशोक कुमार कहते हैं, हमने तो नहीं देखा पर हमारी मां बताती थी कि, बंटवारे की लाइन खिंचने के बाद हम अपने ही गांव में बेगााने हो गए । वे कहते हैं हमारा गांव लाहौर से करीब 30 कोस दूर था। गांव में अच्छा कारोबार था। हिंदू, सिख और मुस्लमानों की आबादी एक जैसी ही थी, लेकिन आजादी मिने के दो दिन बाद (17 अगस्त को) गांव में ऐसी मार-काट मची कि हम अपने गांव में पराए मुल्क के हो गए। गलियों में नारे गूंजने लगे ‘ काफिरों पाकिस्तान छोड़ो, जिंदा नहीं तो हम मार कर भेजेंगे’। इसके बाद हमारे परिवार के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी सब गांव छोड़ कर एक अंजाने शहर में चल पड़े।
पहले लाहौर फिर अमृतसर आए
गेट खजाना के रहने वाले हुकूम चंद बताते हैं, वैसे तो हमारा जन्म बंटवारे के सात माह बाद यहीं अमृतसर में हुआ है। पर हमारा परिवार सिंधी है। और हम गुजारां वाला के रहने वाले हैं। अभी साल पहले पिता जी का निधन हुआ है। वे 90 साल के थे। वे बताते थे कि जब देश बटां तक मैं ( हुकूम चंद) मां के पेट में था। जब दंगा हुआ तो हमारा परिवार बैलगाड़ी पर जरूरत का सामन लाद कर पहले लाहौर पहुंचा, फिर किसी तरह अमृतसर के शराणर्थी शिवर में आया। यह कैंप पुतली घर के पास बना था। यहां कुछ दिन रहने बाद हमारे परिवार को यही खजाना गेट में आशियाना मिल गया था। लेकिन इसी कैंप में मलेरिया से हमारे छोटे चाचा की मौत हो गई।
हाल गेट के बाहर थे सैकड़ों शरणार्थी
प्रो. दरबारी लाल कहते हैं वैसे तो हमारा परिवार अविभाजित भारत के जिला गुजरात का रहने वाला है। गुजरात लाहौर से करीब 120 किलोमीटर की दूरी पर है। इसी जिले में एक गांव होता था गोलेकी जो चीनाव दरिया के पास होता था। यह गांव हिंदू बाहुल्य था, पर पठानों की आबादी भी ठीकठाक थी। हमारा परिवार जमींदार था। देश का बंटवारा हो चुका था। हमारा परिवार यही सोच रहा था पाकिस्तान कोई गैर मुल्क थोड़े ही है। यहीं रहना हैं, लेकिन 1948 में पठानों ने ऐसा बलवा मचाया कि गांव के हिंदू-सिख भागने लगे। उनमें से हम भी एक थे।
गांव गोलेकी से हमारा परिवार पहले गुजरात के शरणार्थी कैंप में पहुंचा। यहां लाहौर के पास डेस्का रेलवे स्टेशन पहुंचा, फिर ट्रेन से बन्नू कोहाठ और गुजरां वाला होते हुए अमृतसर आए। अमृतसर में रेलेव स्टेशन से लेकर हाल गेट पाकिस्तान से आने वाले हिंदू-सिखों के रहने के टेंट लगे, यहां हमारा परिवार करीब चार माह रहा।
कैंप में थम गई सांसें पर चलते रहे
शिवाला गंगाराम के पास रहने वाले राजविंदर कहते हैं, हमारी नानी वीरो पश्चिमी पंजाब (अविभाजित भारत) से माईग्रेट होकर आई थीं। वो पढ़ी-लिखी नहीं थी। बताती थीं कि जब देश का बंटावारा हुआ उस समय उनकी उम्र छह साल थी। उनकी एक बड़ी बहन और भाई भी थे, जो चाचा, ताया और बापू के साथ खच्चर पर जरूरत का सामान लेकर लाहौर की तरफ चल पड़े थे। बापू कहते थे कि अब हमारा ‘मुल्क’ पाकिस्तान बन गया है, हमें हिंदुस्तान जाना है, पर कहां जाना है पता नहीं। लाहौर से कुछ मील की दूरी पर कैंप लगा था। उसमें हिंदुस्तान जाने वाले सभी हिंदू-सिख रुके थे। यहां से आगे लाहौर से गाड़ी पकड़ कर अमृतर आना था। कैंप के हालात ये कि पानी तक नहीं मिलता। नानी बताती थीं कि इसी कैंप में उनके छोटे भाई की जो महज दो माह का था उसकी सांसें थम गई। कई परिवार हमारे जैसे ही थे, किसी का भाई तो किसी का बच्चा इन्हीं कैंपों में मर गया, कोई रो रहा था तो कोई सिसक रहा था। नानी बताती थीं कि इन सब दुखों के बावूजद लोगों का कारवां रुकता नहीं चलता रहता था।
खालसा कालेज के कैंप में रुका था परिवार
गेट हकिमां में रहने वाले बाल किशन कहते हैं, हम सिंधी हैं। हमारा पारिवार सिंध से आया था। हमारे दादा चतर राम बताते थे कि वहां (पाकिस्तान) हमारा अच्छा कारोबार था। वहां सबकुछ छोड़ कर भागना पड़ा। दादा जी का चार साल पहले निधन हुआ था। वह बाते थे परिवार के साथ करीब चार दिन पैदल और तांगे का सफर करके पहले गुरदासपुर पहुंचे। लंबा कारवां चलता था। लोग सोचते थे कि कारवां में चलेंगे तो सुरक्षित रहेंगे। इस बीच यदि कोई रास्ते में मर भी जाता था तो उसे वहीं छोड़ आगे बढ़ जाते थे। बाल किशन बताते हैं, दादा जी के अनुसार गुरदासपुर कैंप में पांच दिन रहने के बाद परिवार अमृतसर की तरफ आया और यहां कैंप में चार माह रहा इसके बाद उन्हें कटरा खजाना में रहने को जगह मिली।
