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जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का…

जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का…

सुखवीर ‘मोटू”
संत कबीर जी की कविता को एक बच्चे द्वारा गाया यह गीत जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का, क्या जीवन क्या मरण कबीरा, खेल तमाशा लकड़ी का बहुत पॉपुलर हुआ था। आज इस समय मैं लकड़ी का मतलब देश के किसान को मानता हूं। हालांकि आप इससे सहमत हों या ना हों, लेकिन जिन सदस्यों को मुझसे किसी तरह की आपत्ति होती है तो उनसे मैं लेख लिखने से पहले ही माफी मांग लेता हूं।

खैर इसमें किसान आखिर लकड़ी क्यों है, यह एक गंभीर विषय है। मेरे देशवासियो कल्पना करो कि अगर हमारे देश में किसान नहीं होते तो हमारे देश के हालात क्या होते। क्या व्यापारी व्यापार कर पाते, क्या पक्षियों को दाना चुग्गा मिल पाता, क्या कारपोरेट घराने इतने अमीर होते, क्या आढतियों को कुछ काम मिल पाता।

क्या हमारे देश के कोने कोने तक अनाज का दाना पहुंच पाता। मैं खुलकर इस पर बहुत कुछ लिखना चाहता हूं कि देश में जो कृषि कानून लाए गए हैं उनसे देश के किसानों को क्या नुक्सान होगा, लेकिन संक्षिप्त में ही आपको बताऊंगा, क्याेंकि आप मुझसे ज्यादा ज्ञानी ध्यानी है।

मेरी नजर में अगर देश में ये कानून लागू होते हैं तो कोई कारपोरेट घराना एक साल उदाहरण के तौर पर हरियाणा में किसानों का गेहूं एमएसपी रेट पर खरीद लेगा। वह पूरे हरियाणा का दाना दाना खरीद लेगा। मगर उसके पास उसकी खपत इतनी नहीं होगी जितनी उसने खरीद की, इसलिए वह उसे अपने स्टॉक में रख लेगा।

नतीजा अगले सीजन में वह गेहूं खरीद में जरा भी रूचि नहीं दिखाएगा, क्योंकि गेहूं का स्टॉक तो उसके पास ऑल रैडी पहले से है ही। इसलिए वह किसी दूसरी फसल को खरीदने में रूचि दिखाएगा और किसानों की दूसरे साल गेहूं की फसल औने पौने दामों पर बिकेगी। हां हो सकता है कि सरकार इन कानूनों को कामयाब करने के लिए अगले 2-3 साल तक मंडियों में आढतियों या कारपोरेट घरानों के माध्यम से खरीद कर किसानों की वाहवाही लूटने का प्रयास करे।

मगर उसके बाद जो असर पड़ेगा मैं उस पर थोड़ा आपका ध्यान डायवर्ट करना चाहता हूं। क्योंकि उसके बाद सरकार कहेगी कि अब किसानों की जींस यानि फसल को कंपनियां खरीदेंगी। उसके बाद यह समस्या हमारे एक किसान के सामने नहीं पूरे देश के किसान के सामने आएगी।

वे पहले साल किसी एक फसल को जमकर खरीदेंगे, अगले साल अगर उस फसल का सूखा पड़ जाए तो उसे अपने मनमाने रेट पर बेचेंगे। इसके अलावा अगर ये फसल जब कंपनियां ही खरीदेंगी तो जिन लोगों को बीपीएल या अंत्योदय योजना के तहत अनाज या दालें आदि मिल रही हैं वह उन्हें कौन देगा।

आज फूड एंड सप्लाई विभाग अनाज की खरीद कर रहा है और सरकार के आदेशानुसार इस तरह के लोगों को हर महीने राशन दे रहा है, लेकिन जब इस क्षेत्र में निजी कंपनी आ जाएंगी तो या तो गरीबों का राशन बंद हो जाएगा या फिर सरकार उन कंपनियों को मोटा मुनाफा पहुंचाकर ऊंचे दाम पर ये चीजें खरीदकर बाकि बचे आम आदमी पर इसका बोझ डालने का काम करेगी। यह मेरे अपने विचार हैं।

हो सकता है मैं गलत होऊं, लेकिन आज के समय देश के किसान को इस मोदी सरकार ने सिर्फ लकड़ी का दर्जा दिया हुआ है। वे इस मामले पर कुछ बोलने की बजाए, किसानों के साथ बैठक में हिस्सा लेने की बजाए वाराणसी में दीपोत्सव कार्यक्रम में तो जाते हैं, लेकिन उन्हें देश के किसानों की जरा भी चिंता नहीं, वे रोजाना दिल्ली बॉर्डर पर अपनी जान गंवा रहे हैं।

उन्होंने तो नरेंद्र तोमर जैसे कृषि मंत्री शायद इस आंदोलन से पहले उनको शपथ ग्रहण समारोह में ही देखा गया था, कभी सामने नहीं आए। सामने तो 2 ही चेहरे आते हैं, एक हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और दूसरे हमारे देश के गृहमंत्री अमित शाह।

मैं थोड़ा हटकर लिखने और सोचने वाला इंसान हूं, इसलिए आपसे निवेदन है कि आप मेरी बात से खफा होते हैं तो मैं एक बार फिर आपसे माफी मांगता हूं। आज अच्छा लगा कि हमारे सांसद ने किसानों को कांग्रेसी कहने की बजाए किसान कहा।

हालांकि सांसद महोदय को पता है कि मैं उनका इसलिए मुरीद हूं कि उनकी राजनैतिक कार्यकुशलता बहुत ही मजबूत है, वे मौके को भुनाने में जरा सी भी देरी नहीं करते। मगर काश: यह शब्द देश के हर नेता की जुबान से निकले।

मगर वे नहीं निकालते। इसलिए फौगाट साहब ये ना समझो कि पत्रकार इस मामले में किसी का सहयोग कर रहे हैं। हमारी मजबूरी है, जब तक काम का समय है, हमें मैनेजमैंट के अनुसार काम करना होता है, उसके बाद आप जिस विषय पर कहो, मैं आपको रोजाना एक लेख भेज सकता हूं। आज के लिए सिर्फ इतना ही।

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