Home मन की बात सभी मंदिरों के प्रबंधक अपने कर्मचारियों को शि​क्षा, चिकित्सा, आवास सुविधाएं दें 

सभी मंदिरों के प्रबंधक अपने कर्मचारियों को शि​क्षा, चिकित्सा, आवास सुविधाएं दें 

by Jharokha
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इन​ दिनों देश के अनेक भागों से दुर्भाग्यपूर्ण समाचार आ रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले जब श्रीरामजन्मभूमि के चंदे में से कुछ कर्मचारियों द्वारा चोरी करने का समाचार आया तो हम सब लोग स्तब्ध रह गए। बड़ी आशा, विश्वास और रामजी की भक्ति भावना से पूर्ण श्रद्धालु जो जाते हैं वे अपनी मेहनत की कमाई से प्रभु चरणों में कुछ अर्पण करते हैं। यथाशक्ति, यथायोग्य धन शक्ति, पर श्रद्धा और भक्ति सबकी एक जैसी।उस भक्ति भाव से पूर्ण जो भी प्रभु चरणों में अर्पित किया जाता है, सबकी इच्छा यही रहती है कि वह रामजी की सेवा में ही लगे। इसके बाद ऐसे बहुत से समाचार मिले— कभी श्री बद्रीनाथ के चढ़ावे में से चोरी का समाचार मिला। कभी वैष्णो माता मंदिर में चांदी असली या नकली का विवाद या असली को नकली करने का आरोप सामने आया। राजस्थान के बुटाटी धाम से भी करोड़ों के चंदे के खुर्द—बुर्द होने के समाचार मिले। इसके अतिरिक्त छोटी छोटी संस्थाओं से छोटे बड़े न करने योग्य कार्यों के समाचार मिलते रहते हैं।
प्रश्न यह है कि हमारे इन धर्म स्थानों में जो सेवा करने वाले हैं वे भगवान को अर्पित धन में से कुछ धन अपनी जेब को अर्पण क्यों कर लेते हैं। शायद जेब का ध्यान करके ही उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित​ मनसा देवी मंदिर के प्रबंधकों ने यह निर्णय ले लिया कि किसी भी पुजारी की यूनिफार्म में जेब नहीं होगी। यह आदेश जारी करने वालों ने बिना सोचे ऐसे आदेश जारी कर दिए। मंदिरों में दो तरह की व्यवस्था रहती है। एक धार्मिक कार्यों की और दूसरी प्रशासनिक कार्यों की। पुजारी तो पूजा करते हैं। सभी प्रकार का कर्मकांड संपन्न करते हैं। हवन यज्ञ करवाते हैं तथा अन्य सभी धार्मिक विधान विधि समत ढंग से पूरा करवाते हैं। चढ़ावा चंदा जहां भी गिना जाता है वहां तो पुजारी होते ही नहीं। अफसोस मनसा देवी मंदिर में पुजारियों के कपड़ों में जेब नहीं होगी कहकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पुजारी ही चंदा चोरी करके ले जाते हैं। यह एकदम अविवेकपूर्णय निर्णय है। रामजन्मभूमि में भी जो लगभग चौदह करोड़ का चढ़ावा चोरी करने का आरोप सामने आया है जिसमें से अब कुछ सिद्ध भी हो गया है वह तो किसी पुजारी ने चोरी नहीं की। फिर पुजारियों पर ऐसा कठोर अपमानजनक आदेश लागू करके एक धार्मिक संस्था ने देश भर के सभी पुजारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
मेरा देश भर की सभी धार्मिक संस्थाओं, मंदिरों के प्रबंधकों तथा अन्य धर्म कार्यों का निरीक्षण करने वालों से यह सीधा प्रश्न है कि क्या कभी आपने सोचा कि जिनको करोड़ों रुपये गिनने का काम सौंपा गया है उनको प्रतिमाह वेतन कितना दिया जाता है। मैं किसी प्रकार की बेईमानी, चोरी का समर्थन नहीं करती, पर प्रबंधकों द्वारा भी तो यह कभी नहीं सोचा गया कि जिसको हम हर माह दस हजार से बीस हजार रुपये तक का वेतन देते हैं उसके अपने जीवन के भी कुछ अभाव आवश्यकताएं होंगी। परिवार की कुछ विवशताएं होंगी। क्या यह आवश्यक नहीं कि जिन व्यक्तियों को मंदिरों में कर्मचारी रखा जाता है, अगर मंदिर के साधन पूरे हैं, चढ़ावा बहुत है, सोना चांदी मंदिरों में चढ़ाया जा रहा है और मोटे मोटे फिक्स डिपाजिट मंदिर के नाम पर बैंकों में बंद हैं तो फिर कर्मचारियों के पेट में पूरी रोटी क्यों न जाए। उनके बच्चों की शिक्षा चिकित्सा का प्रबंध अगर मंदिरों का प्रबंधन बोर्ड कर दे तो ये कर्मचारी संभवत: कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जो कानून विरुद्ध, धर्म विरुद्ध या नैतिकता से परे हो। एक बार मैं फिर कह रही हूं कि जिन्होंने चढ़ावा या चंदा चोरी किया उन्होंने एकदम अनुचित कार्य किया। भक्तों का विश्वास तोड़ा और करोड़ों रुपये घरों में ले जाकर अपनी संपत्ति और सुख सुविधा के साधन बढ़ाने में लगा दिए। उन्हें दंड मिलना चाहिए, पर बड़े मंदिरों के प्रबंधकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने कर्मचारियों को इतना वेतन ​तो दिया जाए कि वे अपने परिवारों का सही पालन पोषण कर सकें। देश के कुछ मंदिर ऐसे हैं पर निजी प्रबंधकों के नहीं, जहां कर्मचारियों को पूरा वेतन तथा कानून अनुसार सभी सुविधाएं मिलती हैं।
भारत में सभी मंदिरों के कर्मचारियों को एक जैसी वेतन व्यवस्था नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मंदिर का प्रबंधन किस संस्था के अधीन है। जिन बड़े मंदिरों का संचालन सरकारी ट्रस्ट, देवस्थानम बोर्ड या वैधानिक समिति करती है, वहां कर्मचारियों को निर्धारित सेवा नियमों के अनुसार वेतन, भत्ते और कई मामलों में पेंशन जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं।
तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (आंध्र प्रदेश) देश का सबसे बड़ा मंदिर ट्रस्ट। यहां हजारों नियमित कर्मचारियों को वेतनमान, महंगाई भत्ता और अन्य सेवा लाभ दिए जाते हैं। समय-समय पर वेतन वृद्धि भी की जाती है। गुरुवायूर देवस्वोम (केरल) यहां कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन और सेवा शर्तें कानून और देवस्वोम नियमों के तहत तय होती हैं। मालाबार देवस्वोम बोर्ड (केरल) के अधीन आने वाले हजारों मंदिरों के कर्मचारियों के लिए स्वीकृत पद और वेतन व्यवस्था लागू है। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड और कोचीन देवस्वोम बोर्ड के अधीन मंदिर कर्मचारियों को नियमबद्ध वेतन और सेवा लाभ दिए जाते हैं।
शिरडी साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट (महाराष्ट्र) में नियमित कर्मचारियों को ट्रस्ट के सेवा नियमों के अनुसार वेतन मिलता है। वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के अधीन कार्यरत कर्मचारियों के लिए निर्धारित वेतनमान और सेवा नियम लागू हैं। श्री माता चिंतपूर्णी मंदिर ट्रस्ट तथा श्री नैना देवी मंदिर ट्रस्ट जैसे कुछ बड़े मंदिरों में भी नियमित कर्मचारियों को तय नियमों के अनुसार वेतन दिया जाता है। इसके विपरीत, देश के हजारों छोटे और स्थानीय मंदिरों में पुजारियों तथा कर्मचारियों का वेतन मंदिर की आय, दान और स्थानीय प्रबंधन पर निर्भर करता है। वहां कोई एक समान राष्ट्रीय वेतनमान लागू नहीं है।
आज देश में श्री रामजन्मभूमि धाम, उज्जैन में भगवान श्री शिव का महाकालेश्वर धाम, वाराणसी जो भगवान श्री शिव का सृष्टि के आदिकाल से ही निवास स्थान है वहां भी बहुत बड़ा कारिडोर, घाट और मंदिर का विस्तार हो गया है। ऐसे अनेक मंदिर देश में हैं। नारायण स्वामी संस्थान, अक्षरधाम संस्थान आदि हैं। इन मंदिरों में निश्चित ही कर्मचारियों की सुख सुविधा का ध्यान रखा जाता होगा, पर मेरा यह निवेदन है कि अगर ये देश के बड़े—बड़े मंदिर अपने कर्मचारियों के परिवारों के लिए अस्पताल बनवाएं, स्कूल बनवाएं, उनकी शिक्षा का पूरा प्रबंध करें और उनके लिए उचित आवास का प्रबंध करें तो हमारे सभी छोटे बड़े मंदिरों के पुजारी, कर्मचारी ससम्मान जीवनयापन कर सकेंगे।
मुझे खेद से लिखना पड़ता है कि अभी हमारे कुछ मंदिर ऐसे हैं जहां चढ़ावा भी है, जहां मंदिर कलश पर सोना भी चढ़ाया जाता है। बैंकों में भी आवश्यक धनराशि जमा है, पर कर्मचारियों को प्रतिदिन तीन सौ रुपये से ज्यादा नहीं मिलता। मुझे एक मंदिर में देखकर यह आश्चर्य हुआ कि जिन कर्मचारी का सेवाकाल 28 वर्ष से ज्यादा हो गया वह आज भी 15000 से 17000 के बीच वेतन मिलता है। जिन पुजारियों से हम हर शुभ अवसर पर आशीर्वाद लेते हैं उनको भी आदर नहीं मिलता, बल्कि अनेकश: अनादर का सामना करना पड़ता है।
मेरा पूरे देश के मंदिरों के प्रबंधकों से, कार्य समिति के सदस्यों से, अन्य सभी भक्त श्रद्धालुओं से यह निवेदन है कि अपने अपने मंदिर में जहां वे प्रतिदिन प्रभु को प्रणाम करने जाते हैं वहां अवश्य देखें कि पुजारी, कर्मचारी की स्थिति क्या है। उनके परिवारों को पूरी रोटी मिलती है या नहीं। बच्चे स्कूल में शिक्षा ले पा रहे हैं या नहीं और उनके परिवार में ऐसे बुजुर्ग तो नहीं जो प्रारंभ से ही अभावग्रस्त जीवन जी रहे हों और जीवन की संध्या में भी अभावों से जूझ रहे हों।
-लक्ष्मीकांता चावला
लेखिका दुर्ग्याणा मंदिर कमेटी की अध्यक्ष हैं। पूर्व में पंजाब सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुकी हैं।
Jharokha

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