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Pitru paksha 2021, बोध गया में ही क्यों करते हैं पिंड दान, जानें रहस्य और कारण

Pitru paksha 2021, बोध गया में ही क्यों करते हैं पिंड दान, जानें रहस्य और कारण

Pitru paksha 2021 : बोध गया को भगवान श्री हरि विष्णु की नगरी गया धाम के रूप में भी जाना जाता है। यहां पितृ पक्ष Pri Pachha में लोग अपने पूर्वजों का तर्पण करने आते है। यही नहीं यह बोध गया बौद्ध धर्म का भी केंद्र है।

भगवान विष्णु की नगरी बोध गया में हर साल पितृ पक्ष मेले के की शुरूआत के साथ ही यहां देश और दुनिया के कोने कोने से हिंदू धर्मावलंबी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में उनका पिंड दान करने आते हैं। वैसे तो मान्यता है कि जो लोग बोध गया नहीं आ सकते अपने अपने पितृ पक्ष में अपने पितरों का तर्पण हरियाणा कुरूक्षेत्र स्थित पिहोवा और उत्तराखंड के हरिद्वार में कर सकते हैं। इसके अलावा अविभाजित भारत के कटासराज (अब पाकिस्तान) में भी सरस्वत ब्राह्मण पितृ पक्ष में अपने पितरों का तर्पण करते थे। वैसे बोध गया की मान्यता अधिक है।

कहा जाता है पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए बोध गया में पिंडदान करना श्रेयकर होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रति वर्ष भादों के शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि तक की पितृ पक्ष या महालय कहलाती है। इस 15 दिन की अवधि में पितरों को पिण्डदान और तर्पण करने की प्रथा युगों युगों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष की इस अवधि में यमराज कुछ समय के लिए पितरों को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें । पितृ पक्ष की इस अवधि में पितर धरती पर श्राद्ध ग्रहण करने आते हैं।

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( Pitru paksha ) पितृ पक्ष की इस अवधि में पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है। इस श्राद्ध कर्म में मुख्य रूप से पिंडदान, जल तर्पण और ब्रह्मभोज कराया जाता है। ब्रह्मपुराण में श्राद्ध की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि जो भी वस्तु उचित कार्य और स्थान पर विधिपूर्वक तथा श्रद्धा से ब्राहाणों को दी जाये वह श्राद्ध कहलाता है।

कहा जाता है कि बोध गया में फल्गु नदी के किनारे भगवान श्री राम ने भी अपने पित दशरथ का पिंडदान किया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ बोध गया में अपने पिता का श्राद्ध करने आए थे। यह समय पितृ पक्ष का था।
कथा के अनुसार बोध गया में फल्गु नदी के तट पर जब भगवान श्री राम पहुंचे तो वे पिंडदान की सामग्री लाने के लिए अपने भाई लक्ष्मण साथ बाहर चले गये थे और सीता अकली फल्गु नदी के तट पर उनका इंतजार कर रहीं थी।

इधर, पिंड दान का समय निकला जा रहा था, लेकिन श्री राम के लौटने में देर हो रही थी। तभी सीता के सामने श्री राम के पिता दशरथ की आत्मा प्रगट हुई पिंड दान की मांग की। सीता ने श्रीराम के आगमन तक की प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया परन्तु वे व्याकुल हो गये और सीता से पिंड दान की मांग करने लगे। तब सीता ने केतकी के फूलों और गाय को साक्षी मानकर बालू के पिण्ड बनाकर महाराज दशरथ के लिए पिण्डदान किया।

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कहा जाता है कि कुछ समय बाद जब श्री राम लौटकर आए तो सीता ने उन्हें सारी बातें बताई, लेकिन श्री राम को भरोसा नहीं हुआ। इसके बाद माता सीता ने महाराज दशरथ की आत्मा का ध्यान कर उन्हीं से गवाही देने की प्रार्थना की, जिसके बाद स्वयं महाराज दशरथ की आत्मा प्रकट हुई और उन्होंने कहा कि सीता ने उनका पिण्डदान कर दिया है।

देश भर से लोग अनंत चतुर्दशी के दिन अपने गांव की परिक्रमा कर सपत्नी बोध गया के लिए रवाना होते हैं, ताकि वे बोध गया पहुंच कर अपने पूर्वजों को पितृ पक्ष में तर्पण कर सकें। बोध गया में बालू का भी पिंड दान किया जता है। वैसे तो चावल के आटे का पिंड बना कर काली तिल के साथ पितरों को पिंड दान किया जाता है।

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