आंत की नली के लिए नुकसानदेह है तनाव

Stress is harmful for intestinal canal

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आंत की नली के लिए नुकसानदेह है तनाव

 

डॉ. राजीव सूद

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डॉ. राजीव सूद

आयुर्वेद विज्ञान  इस बात का संकेत देता है कि अधिक तनाव आंत की नली या जठरांत्र मार्ग के लिए बहुत अधिक नुकसानदायक होता है।  जठरांत्र मार्ग में असंतुलन की वजह से सूजन होता है और पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है। सूजन और पाचन क्रिया सही न होने की वजह से  शरीर में अपशिष्ट पदार्थ जमा होने लगता है और शरीर बीमारियों का शिकार होने लगता है। इसके साथ ही साथ कई प्रकार की बीमारियां भी जन्म लेती हैं।

पंचकर्म के माध्यम से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलता है और  शरीर अधिक सक्रिय हो जाता है। विषाक्त पदार्थ बाहर निकलने और शरीर अधिक सक्रिय होने की वजह से  अधिक उर्जावान महसूस करते हैं और मानसिक स्तर पर भी सुधार होता है।  पाचन क्रिया को मजबूत बना कर पंचकर्म प्राकृतिक रूप से  शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। यही नहीं पंचकर्म आयुर्वेदिक प्रक्रिया के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंग जैसे फेफड़े, मू्त्राशय, पसीने की ग्रंथि, पेट और आंत से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है।

पंचकर्म से पहले दो प्रक्रियाएं हैं, जिसे पूरा करना आवश्यक होता है। पहला ऑयलेशन (शरीर में तेल लगाना) और दूसरा फॉमेंटेशन (शरीर से पसीना निकालना)।

1. ऑयलेशन –

ऑयलेशन प्रक्रिया में  पूरे शरीर में तेल लगाया जाता है। अलग-अलग तरीके से शरीर में तेल से मालिश की जाती है। ऐसा करने से  शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद मिलती है।

2. फॉमेंटेशन –

इस प्रक्रिया में  शरीर से पसीना निकलता है। ऑयलेशन प्रक्रिया में विषाक्त पदार्थ मुलायम हो जाते और फॉमेंटेशन प्रक्रिया में यह विषाक्त पदार्थ पतला या पानी की तरह हो जाते हैं। आयलेशन प्रक्रिया कठोर विषाक्त को मुलायम बनाने का काम करता है, जबकि फॉमेंटेशन पसीने के माध्यम से इसे शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है।

पंचकर्म चिकित्सा के पांच चरण होते हैं। ये पांच चरण इस प्रकार हैं – 

1. पंचकर्म चिकित्सा का पहला चरण: वमन 

इस प्रक्रिया में उल्टी कराया जाता है। शरीर को कुछ दिनों तक आंतरिक और बाहरी रूप से ऑयलेशन और फॉमेंटेशन प्रक्रिया से गुजरना होता है। इन दोनों प्रक्रिया को तब तक करना होता है, जब तक विषाक्त पदार्थ तरल रूप धारण न कर लें। इसके अलावा पूरा विषाक्त पदार्थ शरीर के ऊपरी भाग में इकट्ठा न हो जाए।  इसके बाद उल्टी आने वाली दवा दी जाती है।

उल्टी के माध्यम से ऊतकों से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। जिन लोगों को कफ की समस्या होती है, उन लोगों के लिए वमन आयुर्वेदिक इलाज बहुत अधिक उपयोगी है। इसके साथ ही साथ अस्थमा और मोटापा के रोगियों के लिए यह बहुत काम का है।

2. पंचकर्म चिकित्सा का दूसरा चरण: विरेचन 

विरेचन मलत्याग की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में आंत से विषाक्त पदार्थ को बाहर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में भी ऑयलेशन और फॉमेंटेशन प्रक्रिया से गुजरना होता है। विरेचन प्रक्रिया में जड़ी-बूटियां खिलाई जाती है, जो  आंत से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती हैं।

जिन लोगों के शरीर में पित्त अधिक बनता है, उन लोगों के लिए विरेचन प्रक्रिया बहुत अधिक लाभदायक साबित होती है। इसके साथ ही साथ पीलिया और कोलाइटिस के रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी है।

3. पंचकर्म चिकित्सा का तीसरा चरण: नस्य 

नस्य प्रक्रिया में  नाक के माध्यम से औषधि दी जाती है, जो  सिर वाले भाग से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है। इस प्रक्रिया के लिए  सिर और कंधों पर हल्का मालिश किया जाता है,  इस प्रक्रिया में नाक में एक ड्राप डाला जाता है, जो सिर से अपशिष्ट पदार्थ को निकालने में मदद करता है। सिर से अपशिष्ट पदार्थ निकल जाने के बामाइग्रेन, सिरदर्द और बालों की समस्या से राहत मिलती है। नस्य प्रक्रिया, नाक और सिर से कफ को निकालने के लिए बहुत अच्छा है।

4. पंचकर्म चिकित्सा का चौथा चरण: अनुवासनावस्ती 

अनुवासनावस्ती एक अद्वितीय आयुर्वेदिक उपाय है। इस प्रक्रिया में शरीर से विषाक्त पदार्थ को निकालने के लिए कुछ तरल पेय पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। तेल, दूध और घी जैसे तरल खाद्य पदार्थों को मलाशय में पहुंचाया जाता है। अनुवासनावस्ती पुरानी बीमारी को ठीक करने में बहुत उपयोगी है।

अधिक वात वाले शरीर के लिए यह उपाय बहुत अच्छा माना जाता है। इसके साथ ही साथ यह गठिया, बवासीर और कब्ज के लिए रामबाण साबित होता है। अनुवासनावस्ती वात, पित्त और कफ तीनों दोष के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इस प्रक्रिया को पंचकर्म का आधार माना जाता है।

5. पंचकर्म चिकित्सा का पांचवा चरण: रक्तमोक्षण 

रक्तमोक्षण में  शरीर के खराब खून को साफ किया जाता है। खराब खून की वजह से होने वाली बीमारियों से बचाने में रक्तमोक्षण प्रक्रिया बहुत अधिक उपयोगी है। इस प्रक्रिया में शरीर के किसी खास भाग या फिर पूरे शरीर के खराब खून को साफ किया जाता है। रक्तमोक्षण त्वचा रोग जैसे मुहांसे और एक्जिमा को ठीक करने में बहुत लाभदायक हैैै।

पंचकर्म के फायदे 

  • पंचकर्म शरीर और दिमाग से विषाक्त पदार्थ को बाहर निकलता है।
  • पंचकर्म  स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
  • पंचकर्म  रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। 
  • पंचकर्म बढ़ती उम्र को रोकता है।
  • पंचकर्म शरीर को आराम पहुंचाता है।
  • पंचकर्म  शरीर को पूरी तरह से शुद्ध करता है।
  • पंचकर्म  पाचन क्रिया को मजबूत बनाता है। 
  • पंचकर्म ऊतकों को युवा बनाता है और वजन कम करने में मदद करता है।

पंचकर्म के नुकसान और सावधानियां 

पंचकर्म आयुर्वेदिक इलाज आजकल पूरे दुनिया में बहुत अधिक लोकप्रिय हो रहा है। यह लोगो के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है और स्वास्थ्य के लिए इसके कई फायदे हैं। पंचकर्म  शरीर के लिए किसी भी प्रकार से नुकसानदायक नहीं है। लेकिन फिर भी पंचकर्म चिकित्सा को अपनाने से पहले कुछ सावधानियां जरूर रखनी चाहिए।

पंचकर्म के दौरान सावधानियां

  • इस दौरान केवल गर्म पानी पीएं, गर्म पानी से नहाएं और अन्य काम के लिए भी गर्म पानी का ही इस्तेमाल करें। 
  • पंचकर्म के दौरान दिन में नहीं सोना चाहिए। 
  • पंचकर्म के दौरान अधिक तापमान से बचना चाहिए।
  • पंचकर्म के दौरान देर रात तक नहीं जगना चाहिए। 
  • पंचकर्म के दौरान अधिक तनाव न लें और व्यायाम भी न करें।

लेखक श्री लक्ष्‍मी नारायण आयुर्वेदिल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, लोहगढ, अमृतसर के पंचकर्म विशेषज्ञ  हैंं।

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