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यार न्यूं बेरा कोनी पाट्या यो किसका माणस सै?

यार न्यूं बेरा कोनी पाट्या यो किसका माणस सै?
सुखबीर "मोटू"
सुखबीर “मोटू”

अगर कोई आपके बारे में किसी से यह सवाल पूछे तो आपको कैसा लगेगा। जी हां मेरे साथ एक बार ऐसा हो चुका है। उस समय मैं दैनिक भास्कर में था और एक समाचार ऐसा लिखा था कि वह उस समय की तत्तकालीन सरकार के कुछ नेताओं के खिलाफ था। इस पर एक नेता ने मेरे सीनियर के पास फोन करते हुए मेरे बारे में कहा कि यार न्यूं कोनी बेरा पाट्या यो किसका माणस सै। इसका मतलब आप समझ गए होंगे कि उसका इशारा मेरे बारे में यह पूछना था कि मैं किस पार्टी या नेता के साथ हूं।

उनका कहना था कि जब इनैलो की सरकार आई तो यह इनैलो नेताओं के खिलाफ, कांग्रेस की सरकार आई ताे बंसीलाल परिवार से होने के बावजूद कांग्रेसी नेताओं और भाजपा की सरकार आई तो भाजपाइयों को भी नहीं बख्श रहा। जब मेरे सीनियर ने मुझे यह बताया तो मुझे बहुत हंसी आई।

मैंने उन्हें यूं दिया जवाब

मैंने कहा कि भाई साहब जब मैं पैदा हुआ तो मैं मेरे माता पिता का बेटा था। स्कूल जाने लगा तो स्कूल टाइम में अध्यापकों और घर आने पर फिर माता पिता का, कॉलेज का सफर शुरू हुआ तो कॉलेज में प्रोफेसरों का और वहां से आने पर फिर अपने माता पिता का।

इसके बाद मेरी 17 जुलाई 1997 को शादी हुई तो मैं मेरी लुगाई का माणस बन गया। उसके बाद धीरे धीरे मेरे दो बच्चे एक बेटी और एक बेटा हुआ तो मैं उनका पिता हो गया। इसी दौरान दैनिक भास्कर में संवाददाता का काम करने लगा तो बहल रहते समय मैैं पूरी तरह भास्कर के प्रति समर्पित रहता और घर आने पर अपनी पत्नी का माणस और औलाद का पिता रहा। बाद में मैं दैनिक भास्कर का स्टाफर बना तो कार्यालय टाइम में पूरी तरह संस्थान का समर्पित सिपाही हूं और यहां से जाने के बाद घर पर फिर से अपनी पत्नी का माणस और औलाद का पिता बन जाता हूं। अब आप ही तय करें, कि मैं किसका माणस हूं।

हां जहां तक माणस की बात आती है तो मैं पूरी तरह अपनी पत्नी का ही माणस हूं। बाकि लोग मेरे बारे में कुछ भी सोचते रहें। रही बात उन महाशय के सवाल के जवाब की तो राजनीति में मैं किसी का माणस नहीं। मेरी लड़ाई और कलम हमेशा गलत सिस्टम के खिलाफ हाेती है, बाकि वे ही अनुमान लगा लें।
लेखक हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार हैं।







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बात बहुत छोटी लगती है, लेकिन इसके मायने बहुत हैं।

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