अमृतसर: “जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥” भगवान श्री राम के नाम की यही महिमा अमृतसर के पावन ऐतिहासिक दुर्ग्याणा मंदिर परिसर में साक्षात जीवंत हो उठती है, जहां प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्रि के दौरान अमृतसर का विश्व प्रसिद्ध लंगूर मेला और दशहरा उत्सव मनाया जाता है। रामचरितमानस की चौपाइयों की गूंज के बीच, यह उत्सव भक्ति, वात्सल्य और अनोखी लोक-परंपरा का एक अनूठा संगम है।
ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में इसी पावन भूमि (अमृतसर के लव-कुश गढ़) पर माता सीता के बालकों, लव और कुश ने भगवान श्री राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बांधा था और हनुमान जी को भी यहां बंदी बनाया था। इसी पौराणिक कथा से प्रेरित होकर, आज भी जिन परिवारों की मन्नतें पूरी होती हैं, वे अपने बच्चों को हनुमान जी के सेनापति यानी ‘लंगूर’ के रूप में सजाते हैं। लाल-सुनहरे वस्त्र पहने, हाथों में गदा थामे और चेहरों पर आस्था का सिंदूर लगाए छोटे-छोटे बच्चे जब दुर्ग्याणा मंदिर में ढोल की थाप पर नृत्य करते हैं, तो पूरा वातावरण राममय हो जाता है। अमृतसर का यह दशहरा और लंगूर मेला न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उस अटूट आस्था का प्रतीक है जो नई पीढ़ी को प्रभु राम के आदर्शों और रामायण के संस्कारों से जोड़ती है।
स्थापित की गई हैं रामतीर्थ से लाई गई अखंड ज्योति
सामाजिक समरसता विभाग पंजाब व वाल्मीकि तीर्थ से जुड़े राजू सभ्रवार कहते हैं कि रामलीला मंचन से पहले रामलीला कमेटियों ने वाल्मीकि तीर्थ से अखंड ज्योंति लाकर स्थापित की हैं। अखंड ज्योति लेजाने वालों में पंजाब के अलावा जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली और रास्थान की रामलीला कमेटिया शामिल हैं। यह अखंड ज्योति विजय दशमी तक जलती रहेगी।
हर साल बढ़ती जा रही है लंगूरों की संख्या
राकेश शर्मा के अनुसार अमृतसर के विश्व प्रसिद्ध लंगूर मेले में लंगूर, हनुमान और उनके सेवादारों की संख्या बढ़ती जा रही है। यदि इस वर्ष की बात करें तो 5 हजार से अधिक बच्चे लंगूर बने हैं। इनमें हनुमान बनने वालों की संख्या अलग है। सब से कम उम्र के लंगूरों की बात की जाए तो एक साल के बच्चे और बच्चियां भी शामिल हैं। इनमें कुछ सुखना वाले बच्चे हैं तो कुछ रामकाज को समर्पित।
