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अमृतसर : मैं लाहौरी एक्सप्रेस हूं। हालांकि आज मेरी नई पहचान अमृतसर–देहरादून एक्सप्रेस के रूप में है। यह नाम मुझे 3 जून 1947 के बाद मिला। फिर भी पुराने लोग आज भी मुझे लाहौरी एक्सप्रेस या फुलां वाली गड्डी के नाम से याद करते हैं, क्योंकि उनके मन में मेरा पुराना नाम अब भी बसा हुआ है।
3 जून 1947 का उल्लेख यहां इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिन केवल देश के इतिहास में ही नहीं, बल्कि लाहौरी एक्सप्रेस के इतिहास में भी एक काले दिन के रूप में दर्ज है। देश के विभाजन से जुड़ी इस घटना को इतिहास में 3 June Plan अथवा Mountbatten Plan के नाम से जाना जाता है।
रेलवे विरासत से जुड़े सदस्य एस.पी. सिंह (सुरेंद्र सिंह) के अनुसार, पाकिस्तान बनने से एक दिन पहले की रात लाहौरी एक्सप्रेस देहरादून से यात्रियों को लेकर लाहौर पहुंची थी। अगले दिन जब यह ट्रेन लाहौर से देहरादून के लिए रवाना हुई, तो उसमें बड़ी संख्या में शरणार्थियों के साथ-साथ सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों के क्षत-विक्षत शव भी थे। इस प्रकार यह ट्रेन विभाजन की त्रासदी की मूक साक्षी बनकर भारत की सीमा में प्रवेश कर गई।अमृतसर जंक्शन से रोजाना रात को 09:35 देहरादून जाने वाली लाहौरी एक्सप्रेस (अब अमृतसर-देहरादून एक्सप्रेस) भले ही लाहौर न जाती हो लेकिन अंग्रेजों के जमाने में यह ट्रेन पाकिस्तान, जब भारत का हिस्सा हुआ करता था तब लाहौर से चला करती थी। उस समय लाहौरी एक्सप्रेस का नंबर 143632 डाउन लाहौर- देहरादून होता था।
उत्तर भारत से लाहौर को जोड़ती थी ‘लाहौरी एक्सप्रेस’
एसपी सिंह बताते हैं कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश के उत्तराखंड क्षेत्र और यहां के हरिद्वार व देहरादून सहित अन्य धार्मिक और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को रेलवे से जोड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने योजना बनाई। तब 19वीं शदी का प्रारंभिक चरण था। नार्दन रेलवे के विस्तारी करण की प्रक्रिया चल रही थी। तब मुरादाबाद रेल मंडल के तहत 1899 में देहरादून रेलवे स्टेशन की नींव रखी गई। इसके करीब सात-आठ साल बाद वर्ष 1906-7 में एक सवारी गाड़ी चलाई गई, जिसको नाम दिया गया लाहौरी एक्सप्रेस। जो देहरादून से लाहौर तक जाती थी।
देश विभाजन के बाद गाड़ी नाम और नंबर भी बदला
एसपी सिंह के मुताबिक लाहौरी एक्सप्रेस का नंबर 143631 देहरादून-लाहौर होता था, लेकिन अब यह नंबर कागजों में नहीं है। उन्होंने बताया कि यह ट्रेन रोजना देहरादून से चल कर लौहर तक जाती थी। इस ट्रेन से वारियों के अलावा पार्सल भी भेजे जाते थे, किन्तु देश विभाजन के बाद अब यह ट्रेन देहरादून से अमृतर तक ही चलती है। अब इस ट्रेन को लोग अमृतसर-देहरादून एक्सप्रेस के नाम से जानते हैं। मौजूदा समय में इस गाड़ी का नंबर भी बदल गया है, हलांकि पुराने लोग अब भी इसे लाहौरी एक्सप्रेस के नाम से जानते हैं। अब इसका नाम और नंबर दोनों बदल गया है।
पंजाब, सिंध और मुल्तान से जुड़ा देहरादून
रेलवे के ही एक अन्य अधिकारी ने बताया कि लाहौरी एक्सप्रेस के शुरू होने से अविभाजित भारत के पंजाब, सिंध और मुल्तान जैसे बड़े प्रांत और शहर सीधे तौर पर देहरादून से जुड़ गए। इससे धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार को भी गति मिली। वे कहते हैं, वर्ष 1947 से पहले लाहौर, स्यालकोट, गुजरोवाला, क्वेटा, सरगोधा और मुल्तान सहित अन्य शहरों में हिंदू और सिख बहुसंख्यक थे जो इसी लाहौरी एक्सप्रेस से रुड़की, हरिद्वार और देहरादून तक आते थे। वे कहते हैं कि यह ट्रेन हर समय फूलों से भरी होती थी, इसलिए लोग इसे फूलों वाली गाड़ी भी कहते थे।
सैन्य गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण थी लाहौरी एक्सपेस
एसपी सिंह के मुताबिक अंग्रेजों की सोच दूरदर्शी थी। लाहौरी एक्सप्रेस को शुरू करने पीछे जहां तत्कालीन भारत के पश्चिमी छोर पर रहे हिंदुओं और सिखों को उनके धर्म स्थलों और व्यपारिक प्रतिष्ठानों से जोड़ाना था, वहीं उनका सामरिक हित भी छिपा था। इससे देहरादून, रुढ़की और लैंसडाउन छावनियों में रह रहे ब्रिटश सैनिकों को सीधे लाहौर भेजा जाता था, फिर वहां से आगे की छावनियों में स्थानांतरिक किया जाता था।
बंटवारे का मंजर भी देखा था लाहौरी एक्सप्रेस ने
सहरानपुर से गांधी आश्रम अमृतसर आए 82 वर्षीय महोश्वरी मिश्र कहते हैं, आज भी हमारी उम्र के लोग अमृतसर-देहरादून एक्सप्रेस को लाहौरी एक्सप्रेस ही बोलते हैं। क्योंकि यह हम उम्र के लोगों की जुबान में रच –बस गई है। माहेश्वरी मिश्र कहते हैं लाहौरी का एक स्टापेज सहारनपुर भी होता था, वह आज भी है, लेकिन इस ट्रेन से ऐतिहासिक और दुखद यादें भी जुड़ी हैं। वे कहते हैं, हमारे बुजुर्ग और पाकिस्तान से आकर सहारनपुर में बसे लोग बताते हैं कि जब देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान में हिंदू-सिखों का कत्लेआम हुआ तो शायद लाहौरी एक्सप्रेस ही वह ट्रेन थी जो उधर से लाशें लेकर अमृतसर स्टेशन तक आई थी। यह इस ट्रेन का लाहौर तक अंतिम सफर था।
लोगों के दिलों में बसी है लाहौरी
स्वामी आत्म प्रकाश शास्त्री कहते हैं, आज भले ही लाहौरी एक्सप्रेस का नाम और रूट बदल गया है, लेकिन यह लोगों के दिलों पर देश विभाजन के 70 साल बाद भी राज कर रही है। वे कहते हैं, इसका जीवंत उदाहरण हरिद्वार में मिल जाएगा। आत्म प्रकाश के मुताबिक हरिद्वार में आज भी बन्नू बिरादरी की धर्मशालाएं हैं। इस बिरादरी के लोग लहंदा पंजाब (अविभाजित भारत) के लाहौर, मुल्तान, सरोगोधा, पेशावर आदि शहरों में रहते थे। इनका मुख्यपेशा व्यापार था जो लाहौरी एक्सप्रेस से ही अपनी धर्मशालाओं के लिए अनाज और अन्य जरूरत की वस्तुएं पहुंचाते थे। यही नहीं ज्यादातर लोग अपने स्वजनों की अस्थियां भी इसे ट्रेन से हरिद्वार लाकर विसर्जित करते थे।