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अमृतसर । ‘धुरंधर’ को रुपहले पर्दे पर आए करीब दो माह होने को हैं, लेकिन फिल्म का खुमार अब भी लोगों को दिल-ओ-दिमाग उतरा नहीं है। जितनी सुर्खियों में यह फिल्म है उतना ही इसका विलेन रहमान डकैत और उसकी हवेली। धुरंधर Dhuradhr को रिलिज से लेकर अब तक कुल 50 दिनों में दुनियाभर में 1294 करोड़ की कमाई कर चुकी है। इनमें अकेले भारत में कुल 831 करोड़ से अधिक की कमाई करने वाली इस पूरी फिल्म में यदि सबसे अधिक चर्चा हो रही है तो वह है अक्षय खन्ना के दमदार अभियन और उससे भी बढ़कर उसकी आलीशान हवेली की। इस फिल्म के सफलता के सोपान पर चढ़ाने के लिए फिल्म मेकर ने हर छोटी बड़ी चीज पर ध्यान दिया है। कथा, पटकथा, निर्देशन और फिल्मांकन तो है ही, इनमें से एक है रहमान डकैत हवेली। फिल्म धुरंधर के अधिकांश दृश्यों की शूटिंग अमृतसर की लाल कोठी के अलग-अलग कमरों में की गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्म में जिसे रहमान डकैत की हवेली दिखाया गया है वह कोई फिल्मी सेट नहीं है। बल्कि पंजाब के अमृतसर में मौजूद एक ऐतिहासिक हवेली है, जिसका इतिहास करीब 150 साल से भी अधिक पुराना है। रियल लाफइ में इसे लोग लाल कोठी कहते हैं। इस कोठी की खासियत लकड़ी सीढ़ि़या, दरवाजे, खिड़कियां और फर्श है1
राजपूत, मुगल और इटैलीयन शैली की इस लाल कोठी को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। आइए जानते हैं लाल कोठी का इतिहास और इसकी खासियत।
कहां है ‘रहमान डकैत’ की हवेली
फिल्म धुरंधर में जिस लाल कोठी को रहमान डकैत की हवेली दिखाया है, वह क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम का उत्तर क्षेत्रीय कार्यालय है। लाल कोठी अमृतसर में क्वींस और कूपर रोड के बीच में है। मूल रूप से यह कोठी दो मंजिला है। और इसकी कुल ऊंचाई लगभग 100 फिट के आसपास है। लाल कोठी को सन 1975-76 में गांधी आश्रम के डायरेक्टर रामसुमेर उपाध्याय ने मात्र 7.20 लाख रुपये में खरीदा था, जो अब गांधी आश्रम की मलकीयत है।
लाहौर में भी नहीं है ऐसी कोठी
फिल्म धुरंधर से चर्चा में आई लाल कोठी को अमृतसर के प्रसिद्ध कपड़ा कारोबारी रामचंद्र ने 1876 ईः में करीब 50 हजार रुपये की लागत से बनवाया था। कहा जाता है कि उस इस तरह की कोठी ना लाहौर में थी और ना ही कहीं और। लेकिन रामचंद्र को शराब और शवाब की लत लग गई। उस दौर में इस कोठी में फौव्वारे से लेकर स्वीमिंग पुल तक यानि कि विलासिता के वे सभी साधन मौजूद थे जो होने चाहिए। इसका निर्माण यूरोपियन वास्तुशैली के मुताबिक किया गया है। लाल कोठी के निर्माण में वास्तु विज्ञान के हर उन पहलुओं को ध्यान में रखा गया है जो इमारत को मजबूती प्रदान करते हैं। पहला यह कि इसकी दोनों मंजिलों की दीवारें काफी उंची और मोटी हैं। जबकि इनमें लगाए गए झरोखे जालिदार हैं जो मुगलकालीन वास्तुशैली को दर्शाती हैं। वहीं इसकी छत बनाने में प्रयोग किया गया तरीका ब्रिटिश आर्किटेक्चर का है। आर्किटेक्चर प्रोः संदीप के मुताबिक ब्रिटिश काल में जिन इमारतों का निर्माण किया जाता था वह काफी उंची होती थी और दीवारों पर मिट्टी का लेप लगार प्लाटर किया जाता था ताकि बाहर के तापमान से कमरों के अंदर के तापमान को कम रखा जाय और ये दोनों चीजों का लाल कोठी के निर्माण में ध्यान रखा गया है। दो तरफ से मेहराबदार बरामदों के मध्य बनी इस भव्य कोठी के फर्स व दिवरों पर लगाई गई इटैनियल टाईल्स यानिकि अपने निर्माण के सौ साल से भी अधिक समय के बावजूद अपनी आभा बिखेर रही हैं। कोठी के फर्स पर काले और सफेद रंग के संगमरमर के टुकडे इस तरह से लगाए गए हैं जैसे सतरंज की बिसात बिछाई गई हो। इसके साथ कमरों के दिवारों पर की गई आयल पेंटिंग भितिचित्र का उम्दा प्रदर्शन है।
फर्श पर लगी हैं इटैलियन टाइल्स, खिड़कियों और दरवाजों में रंगीन शीशे
फिल्म धुरंधर में अपनी तरफ लोगों का ध्यान खींचने वाली रहमान डकैत की हवेली यानी लाल कोठी के फर्श पर और दीवारों पर लगी टाइलें और दरवाजों व खिड़ियों के शीशे इटैलियन है। कहा जाता है रामचंद्र खास तौर पर इन वस्तुओं इटली से मंगवाया था। अपने निर्माण के करीब 150 साल बाद भी इन टाइलों और शीशों की चमक आज भी कामय है। शायद अपनी इन्हीं खूबियों के चलते लाल कोठी फिल्म धुरंधर के आर्ट डायरेक्टर का ध्यान अपनी तरफ खिंच पाई जो फिल्म में सभी के आकर्षण का केंद्र बनी है।
कभी भरे होते थे खादी के कपड़े आज हैं खाली
लाल कोठी के जिस कमरे को रहमान डकैत का कमरा दिखाया गया है उसमें कभी ऊनी और खादी के कपड़े भरे होते थे। इसमें करीब 100 से अधिक कर्मचारी काम करते थे, लेकिन आज यह कोठी बिरान पड़ी हुई है। अब इसमें मात्र दो से तीन कर्मचारी ही रह गए हैं। कोठी के दूसरी तरफ जिसमें रणवीर सिंह यानी हमजा मजारी, अक्षय खन्ना यानी रहमान डकैत के बार्वची के हाथों की अंगुलियां काटते हैं उस कमरे में गांधी आश्रम का कार्यलय चलता है। कोठी के चारों तरफ पीपल के दरख्त उग आए हैं और यह उचित देख रखे के अभाव में जर्ज हो रही है।
गांधी और नेहरू भी रह चुके हैं इस कोठी में
लाल कोठी के इतिहास की बात करें तो इस कोठी में महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, पं. मदन मोहन मालवीय सरीखे कई हस्तियां रह रचुकी है। रहमान डकैत की यह हवेली सन 1919 में अमृतसर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन का गवाह भी रही है।
रेखा और ऋषि कपूर भी आ चुके हैं इस कोठी में
बात करें फिल्मों की शूटिंग की तो इस कोठी में धुरंधर से पहले भी कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। इस कोठी में फिल्म सदियां की शूटिंग के दौरान रेखा और ऋषि कपूर आ चुके हैं। अभी हाल ही में फिल्म लाहौर की शूटिंग करके सन्नी देओल भी जा चुके हैं। इससे पहले पंजाबी फिल्म अमृतसरिये की भी शूटिंग हो चुकी है। इसके अलावा कई और फिल्मों की भी शूटिंगें की जा चुकी है।
लाल कोठी के अलावा लोहगढ़ में भी हुई है धुरंधर की शूटिंग
फिल्म धुरंधर में पाकिस्तान के जिस ल्यारी शहर यानी रहमान बलूच के इलाके को दिखाया गया है, दरअसल वह फिल्म का कोई सेट नहीं, बल्कि अमृतसर के लोहगढ़ का इलाका है। इस इलाके में एक घर के छत पर रहमान के गुर्गे रणवीर को उसका घर दिखाते हैं, जिसमें गुरुद्वारा साहिब और पानी की टंकी और छोटे-छोटे घरों की छतें दिखाई देती है। इस इलाके में भी फिल्मों की शूटिंग होती रहती है।
विरासत को संभालने की जरूरत
रहमान डकैत की हवेली के रूप में एक नए लुक में सामने आई लाल कोठी को संभालने की जरूरत है। उपेक्षा और मरम्मत न होने के कारण लाल कोठी की दिवारें दरकने लगी हैं और छतें टूट रही हैं। यहां तक की दीवारों में पीपल और बड़ के दरख्त उगने लगे हैं ।
आतंकवाद के दौर में भी चलता था चरखा
गांधी आश्रम से सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों का कहना है कि लाल कोठी में आतंकवाद के दौर में भी गांधी का चरखा चलता रहता था। यानि यहां सूत की कताई खादी के कपड़ों का निर्माण कभी बंद नहीं हुआ।
शाम होते ही सजती थी महफिल
अमृतसर के चढ़ाव उतार के करीब से देखने वाली कोठी में बने कमरों की खासियत है इसके दरवाजे। इस कोठी के किसी एक कमरे में प्रवेश कर ग्राउंडफ्लोर पर बने सभी कमरों में जाया जा सकता है। जबकि छत पर बनाई गई दो बुर्जियां इसके वैभव की गाथा सुना रही हैं।कहा जाता है। इन बुर्जियों हथियारबंद सुरक्षा कर्मी उस जमाने कोठी की तरफ आने वाले हर किसी पर नजर रखते थे। गांधी आश्रम से सेवानिवृत्त हो चुके त्रिभुवन प्रसाद आचार्य कहते हैं कि लाल कोठी के मालिक रामचंद्र कपडे़ वाला को शराब और मुजरे का बहुत शौक था। शाम ढलते ही लाल कोठी में महफिल सजती थी, जो घुंघरुओं की झंकार व तबले की थाप पर देर रात गुजलजार रहती थी। इस महफिल में उस समय के शहर के बड़े-बड़े रायजादे व रायबहदूर और अंग्रेज अधिकारी शामिल होते थे।
…और पेग में डूब गई कोठी
कहा जाता है कि अपने इसी शौक के चलते रामचंद्र ने एक ऐसी पेंटिंग बनवाई थी, जिसमें लाल कोठी को शराब के प्याले में डूबते हुए दिखया गया था। भले ही राम चंद्र ने अपने इस शौक को पूरा करने के लिए यह चित्र बनवाया हो पर सच में उसके सपनों का महल लालकोठी शराब के पेग में हमेशा के लिए डूब गई । यानि साहुकार अब पूरी तरह कर्जदार हो चुका था। अपने कर्ज को उतारने के लिए राम चंद्र ने अमृतसर के सब्जी व्यापारी लाली साह के हाथों यह कोठी बेच दी। कुछ साल तक लाली शाह की मल्कियत रही लाल कोठी उसके हाथ से भी निकल गई। अबकी बार इस कोठी को लाली शाह नहीं बल्कि उसकी बहु राजकुमारी मेहरा पत्नी दुर्गादास मेहरा ने श्री गांधी आश्रम के प्रबंधकों के हाथ बेच दिया