• June 16, 2021

पंजाब का पहला सिनेमाहॉल चित्रा टाकिज, चंद दिनों का मेहमान

अमृतसर का चित्रा टाकिज अपने आप में एक शदी का इतिहास समेटे हुए है। इसका इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना कि भारतीय सिनेमा का। लेकिन आज संयुक्त पंजाब (पाकिस्तान बनने से पहले का पंजाब) का पहला सिनेमाहॉल इतिहास बनने के कगार पर खड़ा है। चंद दिनों या कुछ सालों का मेहमान चित्रा थिएटर की दिवारें इसकी भव्यता की कहानी खुद ब खुद बयां कर रही हैं।

वाल्ड सिटी का प्रवेश द्वार कहे जानेवाले हाल गेट से पास 119 साले पुराने चित्रा टाकिज की जर्जर इमारों की जगह कोई भव्य शॉपिंग कांप्लेक्स दिखाई दे तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस टाकिज के मौजूदा मालिकों की योजना इस सिनेमाहॉल को तुड़वाकर इसकी जगह मॉल बनाए जाने की है।

1902 में हुआ था चित्रा टाकिज का निर्माण

अमृसर के इतिहास में रुचि रखने वाले सुरेंद्र कोछड़ के अनुसार चित्रा टाकिज का निर्माण माहणा सिंह नागी ने 1902 में करवाया था यानी भारतीय फिल्मों के इतिहास से 11 साल पहले, जबकि भारतीय फिल्मों का निर्माण 1913 में शुरू हुआ था वह भी मूक फिल्मों का। कोछड़ के अनुसार तब इसका नाम रॉयल थिएटर था और इसमें नाटकों का मंचन किया जाता था। उस समय इसे माहणा सिंह के मंडुआ के नाम से भी जाना जाता था।

महाणा सिंह के ही ईंट भट्टों की लगी हैं ईंटे

कहा जाता है कि चित्रा टाकिज के निर्माण में इसके तत्कालीन मालिक महाणा सिंह नागी के ही ईंट भट्टे की बनी ईंटे लगाई हैं। कोछड़ के मुताबिक चित्रा टाकिज बर्तानवी वास्तुशैली का एक उम्दा नमूना है। वक्त के थपेड़ों को सहते हुए आज भले ही चित्रा टाकिज की दिवारें दरक गई हैं, लेकिन भारतीय चलचित्र के शैशव काल से लेकर अब तक के गौरव गाथा को अपने आप में सहेजे हुए है।

पहले रॉयल थिएटर था नाम , बाद में हुआ चित्रा टाकिज

आजादी से पहले इस सिनेमा हॉल का नाम रॉयल थिएटर था। तब इस थिएटर पर ब्रिटिश हुकूमत का झंडा लहराता था। कुछ साल बाद इस थिएटर का नाम बदल कर क्राउन थिएटर कर दिया गया। और अब यह सिनेमाहॉल चित्रा टाकिज के नाम से जाना जाता है। सुरेंद्र कोछड़ के मुताबिक देश की आजादी के बाद इस थिएटर पर भारत की शान तिरंगा बड़े शान से लहराया था।

1913 में राजा हरिशचंद्र का हुआ था प्रदर्शन

इसी चित्रा टाकिज में भारत की पहली पूरी अवधि की बनी हिंदी फिल्म सत्यवादी राजा हरिशचंद्र का प्रदर्शन किया गया था। बताया जाता है कि उस समय बिना आवाज की इस फिल्म को देखने के लिए लोगों हुजूम उमड़ पड़ा था। कोछड़ के अनुसार कुछ समय बाद क्राउन थिएटर का मैनेजर बंबई के रहने वाले मदन एंड कंपनी को बनाया गया।

देश में बोलती फिल्मों का दौर भले ही 1931 में फिल्म आलमआरा से शुरू हुआ था, लेकिन संयुक्त पंजाब के अमृतसर में फिल्म निर्माण के साथ ही पंजाब से सबसे बड़ा सिनेमाघर क्राउन थिएटर अस्तीत्व में आ गया था। हलांकि इस सिनेमाहॉल का आधिकारिक तौर पर उद्घाटन 15 जून 1915 को हुआ था।

लोगों के ठहरने के लिए बनाए गए थे कमरे

अंजुमन स्लामिया से 23000 हजार रुपये में तीन हजार कनाल यानी 1517571 वर्ग मीटर जमीन बनाए गए चित्रा टाकिज में लोगों ठहरने के लिए कमरे बनाए गए थे जो आज भी दिखाई देतें है। यह कमरे इस लिए बनाए गए थे तब संयुक्त पंजाब यानी लाहौर और लुधियाना तक से आने वाले सिनेमा प्रेमी रात को यहा रुक सकें। इस थिएटर में दो बालाकनी सहित करीब एक हजार लोगों के बैठने की क्षमता थी।

कपूर खानदान से भी रहा है गहरा नाता

चित्रा टाकिज का नाता भारतीय सिनेमा के मशहूर कपूर खादान से भी रहा है। प्रसिद्ध शो मैन राजकपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर भी अपनी मंडली के साथ तब के क्राउन थिएटर में नाटकों का मंचन कर चुके हैं। यही नहीं आज का चित्रा टाकिज कभी पंजाबी रंगमंच का धूरा भी रहा है।

वर्ष 2008-09 में आखिरी बार प्रदर्शित हुई थी

पूरानी सब्जी मंडी यूनियन के अध्यक्ष गौरव महाजन कहते हैं कि चित्राटाकिज में वर्ष 2008-2009 में आखिरी बार भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ था। उसके बाद से चित्राटाकिज बंद है। वे कहते हैं यहां टिकट लेने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगती थी। वे कहते हैं टिकट खिड़की कुछ इस तरह से बनी हुई थी कि आप टिकट लेकर पीछे मुड़ने की बजाए आगे निकल कर हाल के गेट तक पहुंच जाते थे। ऐसे ही इस सिनेमा की बॉकनी भी दो थी, ऊपर वाले बॉलकनी की टिकट भी हॉल के टिकट के बाराबर ही थी। गौरव महाजन कहते हैं कि सब वक्त-वक्त की बात है। कभी पंजाब का गौरव रहा चित्रा सिनेमा आज वजूद खत्म होने को। इसकी दरक रही दिवारें इसके भव्यता की कहानी बयां कर रही हैं।

jharokha

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