Table of Contents
thejharokha.com बाबा सोहन सिंह भकना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महानायकों में से थे, जिन्होंने विदेश की धरती पर बैठकर भी भारत की आज़ादी का बिगुल फूंका। वे केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि गदर की उस ज्वाला के प्रतीक थे जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला दिया। साधारण किसान परिवार में जन्मे बाबा भकना ने अपने साहस, संगठन क्षमता और अटूट देशभक्ति के बल पर प्रवासी भारतीयों को एकजुट किया और उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रेरित किया। उनका जीवन त्याग, संघर्ष और राष्ट्रप्रेम की अद्भुत कहानी है, जो आज भी हर भारतीय के हृदय में देशप्रेम की भावना को प्रज्वलित करती है।
अमृतसर-अटारी बार्डर के रास्त में खासा से करीब तीन किलोमीटर दक्षिण की तरफ भकना कलां को एक सड़क जाती है । करीब 3500 की आबादी वाला यह गांव कोई साधारण गांव नहीं है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रा संग्राम के उस नायक का गांव है जिसे इतिहास में गदरी बाबा सोहन सिंह भकना के गांव के नाम से जाना जाता है। काला पानी तक की सजा काट चुके बाबा सोहन ने अपनी जीवन की आखिरी सांस भी भकना कलां में ही ली थी। इतिहास के पन्नों में गुम के बारे में जानते हैं उन्हीं के पड़पोते जसवीर सिंही गिल से-
*बाबा सोहन सिंह भकना का जीवन*
जसवीर सिंह गिल बताते हैं कि बाबा सोहन सिंह का जन्म 4 जनवरी 1870 को पिता कर्म सिंह के घर हुआ था, जबकि निधन 20 दिसंबर 1968 में हुआ था। वे कहते हैं कि सोहन सिंह की शिक्षा गांव के गुरुद्वारा और आर्य समाज में हुई थी, क्योंकि गांव में कोई स्कूल नहीं था। वे पंजाबी, उदू और फारसी अच्छी तरह से जानते थे। 10 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया था। जसवीर सिंह के मुताबिक सोहन सिंह 1900 के दशक में पंजाब में उभरे राष्ट्रवादी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए थे।
*लग गई थी नशे की लत*
बाबा सोहन सिंह के पारिवारिक सदस्य बताते हैं -सोहन सिंह एक अच्छे किसान परिवार थे और इकलौते थे, ऐसे में उन्हें भरपूर लाड़प्यार मिला और इसी लाड़प्यार में वह इस कदर बिगड़े कि वह नशे का सेवन करने लगे, यहां तक कि घर की जमीने बेच कर दोस्तों की जरूरतें पूरी करने लगे। इसी बीच गांव में एक संत का आना हुआ सोहन सिंह कुछ दिन तक उस संत के सेवा में रहे। इसी बीच उनका मन बदलने लगा और वह पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझने लगे थे। इसी बीच उन्होंने 1906-07 में उपनिवेशवाद विरोधी विधेयक के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों में भाग लेना शुरू कर दिया।
*नौकरी की तलाश में पहुंचे अमेरिका और यही से बदली दिशा*
जसवीर सिंह कहते हैं कि पैतृक संपत्ति कब तक काम आती, आखिरकार सोहन सिंह नौकरी की तलाश में कोलकाता बंदरगह से करीब दो माह की लंबी समुद्री यात्रा कर 4 अप्रैल 1909 को अमेरिका के सिएटल पहुंचे और वहां एक लकड़ी के कारखाने में मजदूरी करने लगे। वह करीब 10 साल तक अमेरिका में रहे। इस दौरान उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा। विदेशियों से मिले तानों ने उनके मन में दबी क्रांति की चिंगारी को हवा दी। अमेरिका में ही उन्होंने पंजाबियों को एकत्र करना शुरू कर दिया।दिया। इस दौरान करीब 1908 में पी.एस. खानखोजे , पं. कांशी राम , तारकनाथ दास और भाई भगवान सिंह जैसे भारतीय छात्रों की संस्था स्वतंत्रता लीग से जुड़ गए। इसके बाद सन 1913 में हिंदुस्तान एसोसिएशन नाम से पार्टी बनाई और स्वयं इस पार्टी के अध्यक्ष थे। भकना ने इस पार्टी से पंजाब से अप्रवासियों को जोड़ा और इसे नाम दिया ‘गदर पार्टी’।
*ब्रिटिश हुकूमत को भारत से उखाड़ फेंकना था गदर पार्टी का उद्देश्य*
बाबा सोहन सिंह भकना के पड़पोते जसवीर सिंह कहते हैं कि ग़दर पार्टी का जन्म हिंदुस्तान एसोसिएशन से हुआ था। ‘गदर’ का अंतिम उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के बल पर भारत से ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकना था। इसी उद्देश्य से नवंबर 1913 में ग़दर पार्टी सैन फ्रांसिस्को में युगान्तर आश्रम प्रेस की स्थापना की । और यहीं से ‘हिंदुस्तान ग़दर अखबार’ का प्रकाश शुरू हुआ। गदर अखबर के संपादक खुद सोहन सिंह थे और सदस्यों में करतार सिंह सराभा जैसे कई दिग्गज क्रांतिकारी शामिल थे। हलांकि अंग्रेजों ने इस खबार पर प्रतिबंध लगा दिया।
*लाहौर षड्यंत्र में कलापानी की सजा*
जसबीर सिंह भकना कहते हैं कि गदर पार्टी ने भारतीय सेना की कुछ टुकड़ियों को क्रांति में भाग लेने के तैयार किया था। किन्तु मुखबिरों से अंग्रेजों की इसकी भनक लग गई। वे कहते हैं कि बाबा सोहन सिंह भकना पानी की जहाज से 13 अक्टूबर 1914 को कलकत्ता पहुँचे थे। यहां जहाज से उतरते ही अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए लाहौर जेल भेज दिया। जसबीर सिंह कहते हैं इस केस को अंग्रेजों ने प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस नाम दिया और इस मामले में बाबा सोहन सिंह को फांसी की सजा सुनाई जिसे बाद में काला पानी की सजा में बदल दिया और उन्हें अंडमान की जेल में भेज दिया। फिर यहां से उन्हें 1921 में कोयंबटूर की जेल में भेज दिया। इस दौरान अंग्रेज सरकार ने सोहन सिंह भकना की संपत्ति कुर्क कर ली।
*16 साल बाद रिहाई, फिर जेल भेजा*
सोहन सिंह के वंशजों के अनुसार जेल में रहते हुए लगतार भूख हड़ताल के कारण जब सोहन सिंह की तबियत बिगड़ने लगी तो अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 16 साल बाद जेल से रिहा कर दिया। रिहाई के बाद बाबा सोहन सिंह सोहन सिंह चुप नहीं बैठे । वे ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ का प्रचार करने लगे। इस बीच द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। इस दौरान अंग्रेज सरकार ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन सन 1943 में रिहा कर दिया। जसबीर सिंह कहते हैं कि स्वतंत्रता और विभाजन की घोषणा के बाद उन्हें कई बार फिर जेल भेजा गया, अंततः भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से उन्हें रिहा कर दिया गया।
*गांव में स्मृति स्थल पर गुमनामी की चादर*
बाबा सोहन सिंह के पड़पोते जबीर सिंह बताते हैं – ‘जंग दा होका’ नारा देने वाले क्रांतिकारी सोहन सिंह ब्रिटिश उपनिवेशवाद को समाप्त करने का अपना सपना पूरा होते देख शांतिपूर्ण और गुमनाम जीवन व्यतीत किया। इसके बाद 20 दिसंबर 1968 को गांव भकना कलां में उनका निधन हो गया। गांव के बाहर बने स्मृति स्थल के बारे में जसबीर सिंह कहते हैं कि यह स्थल स्वंय के खर्च पर बनवाया गया है। बाबा जी का अंति संस्कार भी इसी स्थान पर किया। उनकी याद में यहां पर बाबा सोहन सिंह की मूर्ति स्थापित करने के साथ ही एक समाधि स्थल और स्तंभ बनवाया गया। इस स्तंभ पर बाबा सोहन सिंह के विचारों को अंकित किया गया है।
*कभी नहीं ली पेंशन*
बाबा सोहन सिंह को करीब से देख चुके 80 वर्षीय गुरनाम सिंह कहते हैं -बाबा जी का ऊंचा ओहदा था। उन्होंने कभी भी स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन नहीं लिया। इसके लिए उन्होंने अपने बच्चों को भी मना कर रखा था। बाबा जी कहते थे, हमने देश की सेवा की है। इसे बदले हमें कुछ नहीं चाहिए यह हमारा फर्ज था।
*खुद के खर्च पर बनवाया स्कूल*
भकना कलां के लोग कहते हैं सन 1953 में बाब सोहन सिंह ने खुद की जमीन देकर जनता हाई स्कूल का निर्माण करवाया था। उनकी सोच थी कि वह खुद तो स्कूल में नहीं पढ़ पाए, लेकिन आने वाली पीढ़ी शिक्षित हो। स्कूल के साथ ही उन्होंने करीब एक एकड़ जमीन में यादगार बनवाई। जिसमें एक स्तभ स्थापित किया। इस स्तंभ पर उन्होंने लिखवाया ‘ उठो नौजवानों युग बदल रहा है’। इसका मतलब यह था कि नशे सहित अन्य सामाजिक बुराईयों का त्याग कर देश समाज के सेवा के लिए आगे बढ़ो।
*वादे जो आज तक पूरे नहीं हुए*
बाबा सोहन सिंह के वंशज कहते हैं कि 1993 में तत्कालीन मुख्य मंत्र स. बेअंत सिंह बाबा सोहन सिंह भकना को श्रद्धांजलि देने आए थे। इस दौरान उन्होंने यादगार स्थल को बनवाने सहित कई वादे किए। तब से लेकर आज तक कई सरकारें आई और गईं, लेकिन किसी ने भी देश की आजादी में दिए गए बााबा सोहन सिंह के योगदान को याद नहीं किया। और नहीं सोहन सिंह की याद में स्कारी स्तर पर किसी कार्यक्रम का आयोजन करवाया। स्थित यह है कि आज के युवा बाबा सोहन सिंह को जानते तक नहीं।
*स्कूल और स्टेडियम बनवाने की मांग*
जसबीर सिंह कहते हैं न तो हमारे पड़दादा सोहन सिंह ने सरकार से कभी कुछ चाहा और ना ही उनके वंशजों को चाहिए। वे कहते हैं कि हमारी पंजाब सरकार से दरख्वास्त है कि खासा से भकना कलां को जाती सड़क का नाम बाबा सोहन के नाम पर रखा जाए। इसके आला बाबा जी के नाम पर ही कोई खेल स्टेडियम, कालेज और तकनीकि कालेज खोला जाए। युवाओं को बाबा जी के विचारों से अवगत करवाया जाए। इससे पंजाब सरकार की मुहिम ‘ युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान को बल मिलेगा। जसबीर सिंह कहते हैं कि किसी समय स्वयं बाबा जी नशे के दलदल में धंस चुके थे, लेकिन इससे निकल कर उन्होंने ऐसा किर्तिमान स्थापित किया जो इतिहास में स्वर्णाक्षरो में लिखा गया।