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क्रांतिकारियों की सहयोगी थी साइकिल (cycle), भगत सिंह (Bhagat Singh) से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक ने किया था इस्तेमाल

झरोखा न्यूज । साइकिल और उसके उपयोग से हर हिंदुस्तान परिचित है। साइकिल यातायात का सस्ता और शुलभ साधन है। (cycle) साइकिल हर घर में मौजूद हैं। आज आपको झरोखा न्यूज न भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साइकिल (cycle) के योगदान के बारे में बताने जा रहे है।
साइकिल ने अपने आविष्कार से लेकर अब तक सफलता के कई सोपान चढ़े हैं। वैसे तो साइकिल (cycle) का आविष्कार सन् 1816 में पेरिस में एक कारीगर ने किया था। लेकिन पैंडल युक्त पहिए का आविष्कार 1865 में पेरिस के ही रहने वाले लालेमे ने किया था। पर इसकी बढ़ती लोक प्रियता और डिमांड को देखते हुए इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका के यंत्र निर्माताओं ने इसमें कई तरह के सुधार कर सन् 1872 में एक सुंदर रूप दे दिया।

सो जाहिर है कि भारत में साइकिल अंग्रेज लेकर आए होंगे। लेकिन अंग्रेजों की लाई हुई इसी साइकिल को भगत सिंह (Bhagat Singh) से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक ने अंग्रेजों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। 17 नवंबर 1928 में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की मौत के करीब एक माह बाद 17 दिसंबर 1928 को लाला जी की मौत के लिए जिम्मेदार स्काट की हत्या की तिथि निश्चित की गई। लेकिन निशाने में थोड़ी सी चूक हो गई और स्कॉट की जगह असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी सांडर्स क्रांतिकारियों की गोली का निशाना बन गया।
लाहौर में पुलिस मुख्यालय के पास जब क्रांतिकारी भगत सिंह और राजगुरु सांडर्स की हत्या की योजना बना रहे थे, तब उनके पास साइकिल थी। इसमें भगत सिंह (Bhagat Singh) साइकिल का हैंडल पकड़े हुए और राजगुरु साइकिल (cycle) के गेयर पर चैन चढ़ा रहे होते थे। सांडर्स की हत्या के बाद जब ये दोनो क्रांतिकारी वहां से भागे तब भी उनके पास साइकिल थी।

कहा जाता है कि असेंबली में बम फेंकने के आरोप में गिरफ्तार सरदार भगत सिंह (Bhagat Singh) का केस लड़ने के लिए चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी 1931 को पं: मोतीलाल नेहरू से मिलने इलाहाबद स्थित आनंद भवन साइकिल से गए थे। चंद्रशेर आजाद को साइकिल (cycle) बहुत पसंद थी। आनंद भवन से लौटते समय चंद्रशेर आजाद अलफ्रेंड पार्क में अपनी सइकिल खड़ी कर सुस्ताने लगे तभी अंग्रेजों से उनकी मुठभेड़ हो गई और वह शहीद हो गए। साइकिल पर ही आजादी के मतवाले अंग्रेजों के खिलाफ घूम घूम कर लोगों में इस्तिहार बांटते थे।

ये तो रही स्वतंत्रा से पहले कि बात, लेकिन देश की आजादी के बाद भी साइकिल का जलवा कम नहीं हुआ। 1963 में भारत के पहले राकेट को साइकिल (cycle) पर ही लाद कर प्रक्षेपण स्थल तक लाया गया था। बदले समय के साथ-साथ भारत भी सफलता के नित नए शोपान चढ़ता रहा। और थानों से लेकर डाकखानों तक, किसानों से लेकर रइसजादों तक साइकिल पहली पसंद रहीं। यहां तक कि दोधी और डाकिए भी 1990 तक लोगों के घरों तक साइकिल पर ही दस्तक देते रहे। लेकिन 1990 के बाद साइकिल की मांग में थोड़ी कमी जरूर हुई पर आज भी यह गांव गरीब तक पहली पसंद बनी हुई है। यह नहीं चीन के बाद साइकिल का इस्तेमाल करने वाला भारत दुनिया का पहला देश है।







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