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मन की बात

…आखिर मुझे इतनी सारे बातें याद कैसे रह जाती हैं

सुखबीर “मोटू”

जी हां अक्सर जब मैं फेसबुक या किसी ग्रुप में कोई पोस्ट करता हूं, तो कई तो लोग मुझसे फेसबुक पर या फोन पर पूछते हैं कि आपको इतनी पुरानी बातें कैसे याद रह जाती हैं। अब उन्हें क्या बताऊं कि जिस इंसान ने गरीबी से जीवन यापन शुरू किया और अब भी एक प्रकार से गरीबी में ही जीवन व्यतीत कर रहा हूं। इसलिए गरीब इंसान को अपने जीवन में आए हर संकट और हर महत्वपूर्ण घटना हमेशा याद रहती है। अमीरों को भला इस तरह की यादें कैसे याद रहेंगी, क्योंकि उन्होंने तो पूरा जीवन ऐशो आराम में बिताया है।

मगर मुझे तो मेरी पहली कक्षा के कच्चे पेपेरों की भी याद है कि मैं उनमें फेल हो गया था। उस समय हमारे स्कूल में गांव तालू के मास्टर नफे हुआ करते थे। उन्होंने मुझे मोटिवेट करना शुरू किया तो मेरा भी धीरे-धीरे हौंसला बढने लगा। उन दिनों पहली कक्षा के छात्रों को पास और फेल किया जाता था। इसलिए जब पहली कक्षा के पक्के पेपर हुए और 31 मार्च 1980 को हमारा रिजल्ट घोषित किया जाना था। उस समय मेरे साथ मेरे चाचा का बेटा रामबीर भी मेरी ही कक्षा में था। इसलिए नफे मास्टर ने पहले चौथी, उसके बाद तीसरी और दूसरी कक्षा का रिजल्ट घाेषित किया। जब पहली कक्षा के रिजल्ट घोषित होने की बारी आई तो मास्टर नफे ने कहा कि इस कक्षा में रामबीर मांगेराम का फेल बाकि सभी पास।

यह सुनकर मेरे चाचा के बेटे रामबीर को लगा कि शायद उसने कोई पदक हासिल कर लिया। वह उसी समय उछलते हुए बोला ओ बेटे रामबीर मांगेराम का फेल। यह कहते हुए वह उसी समय स्कूल से निकलकर भागने लगा और यह कहता रहा कि रामबीर मांगेराम का फेल। उसका यह रिएक्शन देखकर मैं उसके पीछे-पीछे भागा ताकि उसे रोक सकूं कि वह फेल हुआ है और उसे दूसरी साल भी पहली कक्षा में ही रहना होगा। मगर उसमें उत्सुकता ज्यादा थी और हमारा मकान भी स्कूल से थोड़ी ही दूरी पर है, इसलिए वह मुझसे पहले ही घर पहुंच गया और घर पहुंचते ही वह मकान के आंगन के बीच में खड़ा होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा ओ बेटे रामबीर मांगेराम का फेल बाकि सारे पास। उसी समय मैं भी वहां पहुंच चुका था, लेकिन उसकी आवाज मेरी मौसी और मेरी मां ने सुन ली थी। इसलिए मेरी मौसी ने रामबीर को पकड़कर कहा कि और तेरा होणा बी के था। इब्बै देेखिए जिद तेरा काका (रामबीर अपने पिता को काका कहता था)छुट्टी आवैगा तो तेरा के हाल करैगा। इसके बाद मेरी मौसी ने भी उसे तीन-चार थप्पड़ जड़ दिए। यह देख मेरी मां ने बीच में आकर रामबीर को छुड़वाया और कहा कि इस बच्चे को क्या पता कि फेल और पास क्या होता है।

खैर बात आई गई हो गई और मैं 1984 में पांचवीं पास करने के बाद छठी कक्षा में दाखिले के लिए उस समय बहल के सरकारी हाई स्कूल में पहुंच गया। वहां दाखिले के एक फार्म भरना होता था। जिस पर दाखिला लेने वाले छात्र के किसी अभिभावक के हस्ताक्षर होने जरूरी थे। मगर मेरे बाबा की उन दिनों अमृतसर में पोस्टिंग थी और मेरी मां अंगूठा छाप। खैर मैं बिना अभिभावक के हस्ताक्षर के ही अपना फार्म लेकर छठी कक्षा के इंचार्ज मास्टर हरिसिंह के पास पहुंच गया। उन्होंने मुझसे कहा कि इस पर मेरे किसी अभिभावक के हस्ताक्षर क्याें नहीं। इस पर मैंने उनसे कह दिया कि मेरे पिता इन दिनों अमृतसर में हैं तो मां अनपढ है। इस पर मास्टर हरिसिंह ने कहा कि इस पर अभिभावक के हस्ताक्षर हुए बिना दाखिला नहीं हो सकता। इसके बाद मैं स्कूल से बाहर आया और अपने पिता के हस्ताक्षर खुद ही कर कुछ देर बाद फिर मास्टर हरिसिंह के पास पहुंच गया। हालांकि मैं अपने पिता के हस्ताक्षर हूबहू कर लेता था। मगर मेरे उस फार्म को देख मास्टर हरिसिंह ने कहा कि अब यह हस्ताक्षर किसने किए। मैंने कहा कि सर मैंने ही किए हैं। इस पर उन्होंने एक छोटी सी डंडी ली और मेरे हाथ उल्टे कराकर उन पर तड़ातड़ उस डंडी से मेरे हाथों पर वार करने शुरू कर दिए, हालांकि दर्द बहुत हो रहा था, लेकिन सहन भी करना पड़ रहा था, क्योंकि मेरी मजबूरी थी।

उसी समय वहां कार्यरत मेरे गांव का एक अध्यापक आ गया और यह नजारा देख उन्होंने मास्टर हरिसिंह से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह अपने पिता के फर्जी हस्ताक्षर करके लाया है। इस पर मेरे गांव वाले अध्यापक ने कहा कि मैं इसके ही परिवार से हूं। इसलिए अाप इसे पीटना छोड़ें और मैं खुद इसके अभिभावक के तौर पर हस्ताक्षर करता हूं। इस प्रकार से बहल स्कूल में पहले दिन मेरा इस तरह इस्तकबाल हुआ जो मुझे अब भी याद है। इसके बाद मास्टर हरिसिंह हमें अंग्रेजी पढाने आते थे। मैं बहुत जल्द अंग्रेजी पर पकड़ गया। इसलिए मास्टर हरिसिंंह मुझे अंग्रेजी कि किताब उठाकर पढने के लिए अपने पास खड़ा कर लेते। उनमें एक आदत थी कि वे पढाते पढाते ही कुर्सी पर सो जाते थे। इसलिए जब मुझे लगता कि वे सो गए हैं तो मैं पहले से ही उनके लिए अपने कुर्ते की जेब में माचिस की तीली रखता था। इसलिए वह तीली या तो उनकी कान में या नाक में घुसेड़ देता था। इस पर वे एकदम से चाैंकते तो मैं एकदम से फिर किताब पढना शुरू कर देता। उक्त अध्यापक के साथ मेरी यह अठखेलियां आठवीं कक्षा तक चलता रहा। बाद में नौंवी कक्षा में मास्टर हरिसिंह हमें नहीं पढाते थे। इसलिए वे साल मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं।

लेखक हरियाणा के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं







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